महाराजा सूरजमल: अजेय रणनीतिकार और 'जाटों के प्लेटो'
महाराजा सूरजमल (फरवरी 1707 – 25 दिसंबर 1763) भरतपुर रियासत के संस्थापक शासक, अद्वितीय योद्धा और कूटनीतिज्ञ थे। 18वीं शताब्दी के उथल-पुथल भरे दौर में—जब मुग़ल सत्ता बिखर रही थी और अफ़गान आक्रमणकारी लूटपाट मचा रहे थे—महाराजा सूरजमल ने अपनी सैन्य प्रतिभा और सूझबूझ से एक शक्तिशाली और अजेय हिंदू साम्राज्य की स्थापना की। उनकी असाधारण बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता के कारण समकालीन इतिहासकारों ने उन्हें 'जाटों का प्लेटो' (Plato of the Jat Tribe) और 'जाट यूलिसिस' की उपाधि दी।
प्रारंभिक जीवन और राज्याभिषेक
- जन्म: फरवरी 1707 में भरतपुर के संस्थापक ठाकुर बदन सिंह के घर हुआ।
- सैन्य शिक्षा: बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र, घुड़सवारी और सैन्य रणनीति में दक्ष सूरजमल ने कम उम्र में ही पिता के साम्राज्य विस्तार और प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू कर दी थी।
- भरतपुर की नींव: 1733 में उन्होंने खेमकरण सोगरिया को पराजित कर अभेद्य लोहागढ़ दुर्ग और वर्तमान भरतपुर शहर की नींव रखी। 1756 में बदन सिंह के निधन के बाद वे विधिवत रूप से भरतपुर के छत्रपति शासक बने।
लोहागढ़ दुर्ग: कभी न जीता जा सका किला
महाराजा सूरजमल द्वारा बनवाया गया लोहागढ़ किला (Iron Fort) भारतीय सैन्य वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है:
- मिट्टी और पत्थरों की दोहरी प्राचीरों से निर्मित इस किले की दीवारों में तोप के गोले धँसकर ठंडे हो जाते थे और कोई नुकसान नहीं पहुँचा पाते थे।
- किले के चारों ओर गहरी खाई (सुजान गंगा नहर) खोदी गई थी, जिसे पानी से भरकर सुरक्षित रखा जाता था।
- इस अभेद्य किले को मुग़ल, अफ़गान या मराठा ही नहीं, बल्कि बाद के वर्षों में शक्तिशाली ब्रिटिश सेना भी कभी जीत नहीं पाई।
सैन्य उपलब्धियाँ और कूटनीति
सूरजमल ने अपने शासनकाल में लगभग 80 युद्ध लड़े और वे कभी किसी युद्ध में पराजित नहीं हुए:
- कुम्हेर का घेरा (1754): मराठा पेशवा और मुग़ल वज़ीर गाज़ीउद्दीन ने कुम्हेर किले को महीनों तक घेरे रखा। खंडेराव होलकर इसी युद्ध में मारे गए। महाराजा सूरजमल के अदम्य साहस और दृढ़ता के आगे अंततः मराठा सेना को संधि करने पर विवश होना पड़ा।
- साम्राज्य विस्तार: उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं को आगरा, मथुरा, हाथरस, अलीगढ़, मेरठ, रोहतक, मेवात और रेवाड़ी तक विस्तृत किया।
- आगरा पर विजय (1761): पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद उन्होंने मुग़ल राजधानी आगरा पर अधिकार कर लाल किले पर अपना ध्वज फहराया।
पानीपत का तीसरा युद्ध (1761) और मानवीय दृष्टिकोण
अहमद शाह अब्दाली के ख़िलाफ़ 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में महाराजा सूरजमल की दूरदर्शिता स्पष्ट रूप से सामने आई:
- रणनीतिक सलाह: उन्होंने मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ को सलाह दी थी कि अफ़गानों के विरुद्ध भारी तोपों और स्त्रियों/परिवारों को युद्धक्षेत्र में न ले जाएँ और पारंपरिक छापामार (गुरिल्ला) युद्ध पद्धति अपनाएँ। हठधर्मिता के कारण भाऊ ने यह सलाह नहीं मानी।
- शरणागतों की सेवा: पानीपत में मराठों की भीषण पराजय के बाद भूख, प्यास और ठंड से तड़पते हुए लाखों घायल मराठा सैनिकों, महिलाओं और बच्चों को सूरजमल और महारानी किशोरी ने भरतपुर में शरण दी। महीनों तक उनके भोजन, वस्त्र और चिकित्सा की व्यवस्था की तथा उन्हें सुरक्षित दक्षिण भारत पहुँचाया।
अमर बलिदान
25 दिसंबर 1763 को दिल्ली के पास हिंडन नदी के तट पर मुग़ल रुहेला सरदार नजीबुद्दौला की सेना के साथ हुए एक अचानक और भीषण संघर्ष में महाराजा सूरजमल ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।
विरासत और मूल्यांकन
- कुशल प्रशासक: वे केवल योद्धा नहीं थे, बल्कि उन्होंने कर व्यवस्था, कृषि विकास और व्यापार को बढ़ावा देकर भरतपुर को उस समय का सबसे समृद्ध राज्य बनाया।
- धार्मिक सहिष्णुता: उनके राज्य में सभी धर्मों और जातियों का समान सम्मान था। उनकी सेना और प्रशासन में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही उच्च पदों पर निष्ठापूर्वक आसीन थे।
- वास्तुकला के संरक्षक: डीग के प्रसिद्ध जलमहल, भरतपुर के उद्यान और महल उनकी कलाप्रियता के जीवंत प्रतीक हैं।
महाराजा सूरजमल का जीवन यह सिद्ध करता है कि दृढ़ संकल्प, कूटनीतिक विवेक और प्रजा के प्रति निःस्वार्थ समर्पण से किसी भी साम्राज्य को अजेय बनाया जा सकता है।