भारत के 11 प्रसिद्ध हनुमान मंदिर, जिनके दर्शन अवश्य करने चाहिए

सात चिरंजीवियों मैं से एक और माता अंजनी एवं वानरराज केसरी के पुत्र और प्रबल प्रतापी श्री हनुमानजी जिनको संकटमोचन, बजरंगबली, मारुतिनंदन, पवनपुत्र आदि अन्य नामों से भी सम्बोधित किया जाता है को कौन नहीं जानता। देवाधिदेव महादेव शंकर के अवतार और भगवन श्री राम के अनन्य भक्त श्री हनुमान जी का रामायण मैं योगदान और प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी भक्ति दुर्लभ ही देखने को मिलेगी।

हनुमान जी को उनकी अद्भुत शक्ति, भक्ति और समर्पण के लिए पूजा जाता है। भारतीय संस्कृति में हनुमान जी को शक्ति, साहस और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है। भारत के कोने-कोने में भगवान हनुमान के अनगिनत मंदिर स्थित हैं, जिनमें से कुछ अपनी ऐतिहासिकता, वास्तुकला और आस्था के लिए अद्वितीय हैं।

इस लेख में हम ऐसे ही प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों की जानकारी देंगे, जो हर भक्त को कम से कम एक बार दर्शन जरूर करने चाहिए।

1. श्री हनुमान गढ़ी, अयोध्या-उत्तर प्रदेश

यह मंदिर उस स्थान पर स्थित है, जहाँ हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा में अपने जीवन को समर्पित किया था। जब रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम अयोध्या लौटे, तो हनुमानजी यहां रहने लगे। इसीलिए इसका नाम हनुमानगढ़ या हनुमान कोट रखा गया। यहीं से हनुमानजी रामकोट की रक्षा करते हैं। इसलिए यह स्थल हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और बल का प्रतीक माना जाता है।

मुख्य आकर्षण:

  • अयोध्या के मध्य में स्थित, 76 सीढ़ियाँ हनुमानगढ़ी तक जाती हैं।
  • मुख्य मंदिर मैं हनुमान जी बाल्यावस्था मैं माता अंजनी की गोद मैं बैठे हुए हैं।
  • अयोध्या के कोतवाल होने के कारण, यहाँ प्रथा है कि राम मंदिर जाने से पहले सबसे पहले भगवान हनुमान मंदिर के दर्शन करने चाहिए।
  • चोला चढ़ाने से व्‍यक्ति को मिलती है दोष से मुक्ति।

2. संकट मोचन हनुमान मंदिर, वाराणसी-उत्तर प्रदेश

वाराणसी का संकट मोचन हनुमान मंदिर तुलसीदास जी द्वारा स्थापित किया गया था। यह मंदिर गंगा नदी के किनारे स्थित है और वाराणसी की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। इस मंदिर में भगवान हनुमान की पूजा संकटमोचन रूप में की जाती है, जो भक्तों के सभी संकट दूर करते हैं।

मुख्य आकर्षण:

  • मंदिर के गर्भगृह में सिंदूर से लिपटी हनुमान जी की मूर्ति है।
  • इस मंदिर में जागृत अवस्था में हनुमान जी को माना जाता है।
  • हर मंगलवार और शनिवार को सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का विशेष पाठ होता है।
  • इस मंदिर में चढ़ाए जाने वाले लड्डू बहुत मशहूर हैं।
  • नवरात्रि और हनुमान जयंती पर विशेष आयोजन होता है।

3. प्राचीन हनुमान मंदिर, कनाट प्लेस-दिल्ली

दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में स्थित यह मंदिर भारत के सबसे प्राचीन हनुमान मंदिरों में से एक है। कहा जाता है कि यह मंदिर महाभारत काल से अस्तित्व में है। मान्यता अनुसार प्रसिद्ध भक्तिकालीन संत तुलसीदास जी ने दिल्ली यात्रा के समय इस मंदिर में भी दर्शन किये थे। उन्होंने इस स्थल पर ही हनुमान चालीसा की रचना की थी।

मुख्य आकर्षण:

  • हनुमान जी की मूर्ति पर सिंदूर का विशेष लेप किया जाता है।
  • भक्तों को यहां अमरफल (चिरंजीवी होने का आशीर्वाद) का प्रतीक नारियल प्रसाद स्वरूप मिलता है।
  • मंदिर की छत पर स्थित “श्रीराम” लिखा हुआ चक्र भक्तों के लिए एक बड़ा आकर्षण है।

4. महावीर मंदिर, पटना-बिहार

महावीर मंदिर, पटना के हृदय में स्थित बिहार का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। पटना जंक्शन के समीप स्थित महावीर मंदिर, भारत के प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में से एक है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सामाजिक सेवा के लिए भी प्रसिद्ध है। यह बिहार का एक प्रमुख तीर्थस्थल है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान हनुमान का आशीर्वाद लेने आते हैं।

मुख्य आकर्षण:

  • यहां भगवान हनुमान की दो युग्म प्रतिमाएं हैं।
  • एक प्रतिमा मनोकामना पूर्ण करती है तो दूसरी सभी कष्टों का हरण करती है।
  • यहां का प्रसाद नैवेद्यम पूरे देश में प्रसिद्ध है।
  • हनुमान जयंती के अवसर पर विशेष पूजा और भंडारे का आयोजन होता है।
  • मंदिर परिसर में संचालित अस्पताल और कैंसर शोध केंद्र सामाजिक सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • यहाँ हनुमान जी के दर्शन के लिए हर दिन हजारों भक्त आते हैं।

5. सालासर बालाजी मंदिर, चुरूराजस्थान

राजस्थान के चुरू जिले में स्थित सालासर बालाजी मंदिर का महत्व पूरे भारत में है। यह मंदिर अपनी विशिष्ट मूर्ति और यहाँ पूरी होने वाली मनोकामनाओं के लिए जाना जाता है। यह माना जाता है कि बालाजी महाराज अपने भक्तों की हर समस्या का समाधान करते हैं।

मुख्य आकर्षण:

  • हनुमान जी की मूर्ति में मूंछ और दाढ़ी का विशेष चित्रण किया गया है।
  • भक्त लाल धागा चढ़ाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति की कामना करते हैं।
  • हर साल भाद्रपद और चैत्र में आयोजित होने वाले मेले में लाखों श्रद्धालु आते हैं।
  • यहां चढ़ाए गए नारियलों का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें खेत में गड्ढा खोदकर दबा दिया जाता है।
  • मंदिर के पास कई धर्मशालाएं और भोजनालय हैं, जहां भक्तों को नि:शुल्क सेवा प्रदान की जाती है।

6. मेहंदीपुर बालाजी, दौसाराजस्थान

जयपुर और दौसा जिले के बीच स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर को भारत का सबसे रहस्यमय मंदिर माना जाता है। यह मंदिर मानसिक और शारीरिक समस्याओं से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर दो पहाड़ियों के बीच बना है और इसे घाटा मेहंदीपुर भी कहा जाता है।

मुख्य आकर्षण:

  • यहाँ आने वाले भक्त विशेष पूजा और हवन के माध्यम से नकारात्मक ऊर्जा से छुटकारा पाने की प्रार्थना करते हैं।
  • यहाँ प्रसाद में लड्डू मिलता है जिसे वहीं खाने की परंपरा है।
  • यहां तीन देवों की पूजा की जाती है – श्री बालाजी महाराज, श्री प्रेतराज सरकार, और श्री कोतवाल (भैरव बाबा )।
  • इस मंदिर में हनुमान जी की बाल रूप मूर्ति है, जो किसी कलाकार ने नहीं बनाई है, बल्कि यह स्वयंभू है।

7. हनुमान धारा मंदिर, चित्रकूट-उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित चित्रकूट अपने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थित हनुमान धारा मंदिर श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक अनूठा स्थल है। यह मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित है और रामायण काल की घटनाओं से जुड़ा हुआ है।

मुख्य आकर्षण:

  • जब भगवान हनुमान ने लंका दहन के बाद श्रीराम की सेवा की, तो उनकी पूंछ में लगी अग्नि को शांत करने के लिए भगवान श्रीराम ने इस स्थान पर जलधारा का सृजन किया।
  • इस पवित्र धारा का जल आज भी बिना किसी बाहरी स्रोत के प्रवाहित होता है, जिसे चमत्कारिक और पवित्र माना जाता है।
  • ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों के बीच है, जहां से प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है।

8. पंचमुखी हनुमान मंदिर, रामेश्वरम-तमिलनाडु

श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित एक मंदिर है, जो भगवान हनुमान को समर्पित है। यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला और तैरते पत्थरों की उपस्थिति के लिए जाना जाता है, जिनके बारे में कहा जाता है कि इनका इस्तेमाल भारत को श्रीलंका से जोड़ने वाले राम सेतु पुल के निर्माण में किया गया था।

मुख्य आकर्षण:

  • मंदिर मैं मौजूद भगवान हनुमान की पंचमुखी प्रतिमा उनकी शक्ति और वीरता को दर्शाती है।
  • मंदिर परिसर मैं मौजूद पत्थर पानी पर तैरते रहते हैं।
  • माना जाता है कि यह मंदिर करीब 500 साल पुराना है और इसे हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है।

9. बागेश्वर धाम बालाजी मंदिर, छतरपुर-मध्य प्रदेश

बागेश्वर धाम बालाजी मंदिर, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित, भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यह स्थान भगवान हनुमान को समर्पित है और यहां देशभर से लाखों श्रद्धालु अपनी समस्याओं के समाधान और आध्यात्मिक शांति के लिए आते हैं।

मुख्य आकर्षण:

  • यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी समस्याओं के समाधान के लिए “पर्ची” में लिखकर प्रार्थना करते हैं। यह विश्वास है कि उनकी हर मनोकामना भगवान हनुमान की कृपा से पूरी होती है।
  • मंगलवार और शनिवार को विशेष भीड़ होती है।
  • बागेश्वर धाम का मंदिर हरे-भरे प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित है। यहां भगवान हनुमान की भव्य मूर्ति स्थापित है।
  • हनुमान जयंती और रामनवमी पर यहां बड़े धार्मिक आयोजन होते हैं।

10. यंत्रोधरका हनुमान मंदिर, हम्पी-कर्नाटक

हनुमान जी को समर्पित एक हिंदू मंदिर है जिसे प्राणदेव या रामभक्त हनुमान मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर की वास्तुकला में विजयनगर शैली का उत्कृष्ट नमूना देखने को मिलता है। इसमें जटिल नक्काशीदार खंभे और शांत वातावरण है। मंदिर से आसपास के परिदृश्य का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है।

मुख्य आकर्षण:

  • मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी का जन्मस्थान यहीं हुआ था।
  • मंदिर के चहुँ ओर फैले पत्थरों के बारे मैं प्रचलित है कि ये सब माता अंजनी के दुग्ध की एक बूँद के पहाड़ी पर पड़ने से वो पूरी पहाड़ी टूटकर बिखर गयी।
  • यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल हम्पी के खंडहरों के बीच बसा है यंत्रोधरका हनुमान मंदिर।
  • मान्यता है की भगवान राम और हनुमान जी की मुलाकात भी पहली बार यहीं हुयी थी।

11. नमक्कल आंजनेयार मंदिर, नमक्कल-तमिलनाडु

तमिलनाडु के नमक्कल जिले में पहाड़ियों के बीच मौजूद आंजनेयार मंदिर दुनिया के सबसे प्राचीन हनुमान मंदिरों में से एक है। करीब 5 शताब्दी के दौरान बनाए गए इस मंदिर में भगवान हनुमान की 18 फीट ऊंची प्रतिमा हाथ जोड़े खड़ी है। खास बात ये है कि इस मंदिर में भगवान हनुमान श्रीराम नहीं बल्कि विष्णु के ही अवतार भगवान नृसिंह की सेवा में खड़े हैं।  इस मंदिर को लेकर कई सारी कथाएं हैं। इसे भगवान विष्णु, लक्ष्मी और हनुमान से जोड़ा जाता है। मंदिर के सामने एक पहाड़ी है, इसे नृसिंह हिल कहा जाता है। मान्यता है कि इस पहाड़ी में देवी लक्ष्मी को भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में दर्शन दिए थे।

मुख्य आकर्षण:

  • मंदिर में हनुमान की 18 फ़ीट ऊंची मूर्ति है।
  • माता लक्ष्मी यहीं पर विष्णु भगवान की तपस्या मैं लीं थी ताकि उनको भगवान के नरसिंह अवतार के दर्शन हो सकें।
  • मंदिर में चार दैनिक अनुष्ठान और कई वार्षिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं।
  • अंजनेयर की छवि एक ही पत्थर को तराश कर बनाई गई है और माना जाता है कि यह 5वीं शताब्दी से मौजूद है।

भारत मैं स्थित हनुमान मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं हैं, बल्कि ये हमारी संस्कृति, वास्तुकला और आस्था का प्रतीक भी हैं। इन मंदिरों की यात्रा भक्तों को न केवल आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है, बल्कि उन्हें अपने भीतर की शांति और भक्ति का अनुभव भी कराती है।

हनुमान जी के जीवन और कार्यों से हमें प्रेरणा मिलती है कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ भक्ति, निष्ठा, और साहस है। वे अपने भक्तों के लिए एक आदर्श देवता हैं, जो हमें यह सिखाते हैं कि अपने कर्तव्यों को निभाते हुए, जीवन में सच्चे प्रेम और समर्पण के साथ भगवान की सेवा करनी चाहिए। हनुमान जी का आशीर्वाद हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाए।

“जय श्री राम, जय हनुमान!”

क्या आप इनमें से किसी मंदिर के दर्शन कर चुके हैं? अपने अनुभव हमारे साथ साझा करें और अन्य भक्तों को प्रेरित करें।

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श्री हनुमान चालीसा (अर्थ सहित) हिंदी मैं

हनुमान चालीसा का लेखन गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया था। तुलसीदास जी, जिन्हें भारतीय भक्ति साहित्य के महान कवि और संत के रूप में जाना जाता है, का उद्देश्य हनुमान जी की शक्ति, भक्ति, और समर्पण की महिमा का गुणगान करना है। तुलसीदास जी ने इस चालीसा की रचना मुख्य रूप से यह बताने के लिए की थी कि हनुमान जी के स्मरण और भक्ति से भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट, भय और बाधाएं दूर हो सकती हैं। इसमें हनुमान जी के जीवन के प्रमुख घटनाओं का वर्णन भी मिलता है, जैसे कि श्री राम की सेवा में उनका योगदान, उनकी वीरता, और उनकी अद्वितीय भक्ति।

इसके अलावा, हनुमान चालीसा के माध्यम से तुलसीदास जी ने साधारण जनों को भी हनुमान जी के प्रति भक्ति और आस्था की ओर प्रेरित किया, क्योंकि यह सरल और समझने में आसान है, और इसे नियमित रूप से पढ़ने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार ।
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ॥

अर्थ: गुरु महाराज के चरणों की धूल से पवित्र मन को पवित्र कर प्रभु श्रीराम के पवित्र और निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाले हैं। हे पवनपुत्र हनुमान जी मैं आपका स्मरण करता हूँ, आप मेरी बुद्धिहीनता और दुर्बलता को स्वीकार करते हुए, मेरे सभी क्लेशों और विकारों का नाश करें और मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करें।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥

अर्थ: हे हनुमान जी आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं, हे कपीस राज आप तीनों लोकों मैं प्रसिद्द हैं, आप की जय हो।

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥

अर्थ: अतुलित बल धारण करने वाले हे अंजनी पुत्र, हे पवन सुत आप प्रभु के राम के दूत हैं।

महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥

अर्थ: आप महा पराक्रमी और बलशाली हैं, आप कुमति को दंड देते हैं और सुमति की सदैव सहायता करते हैं।

कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुँचित केसा ॥

अर्थ: आपकी काया स्वर्ण जैसी है, जिसपर आप सुन्दर वस्त्र, कानो मैं कुण्डल हैं और सुन्दर केशों को धारण करते हैं।

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे ।
काँधे मूँज जनेऊ साजे ॥

अर्थ: आपके एक हाथ मैं वज्रा और दूजे मैं ध्वज विराजमान हैं और आप जनेऊ से सुशोभित हैं।

शंकर सुवन केसरी नंदन ।
तेज प्रताप महा जगवंदन ॥

अर्थ: हे केसरी नंदन, आप स्वयं महादेव शंकर का अवतार हैं और अपने पराक्रम और यश का समस्त विश्व वंदन करता है।

विद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥

अर्थ: आप अति विद्वान एवं चतुर हैं और प्रभु श्री राम के काम करने के लिए सदैव ही आतुर रहते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मनबसिया ॥

अर्थ: आप को प्रभु श्री राम की स्तुति सुनना अधिक आनंद प्रिय है, प्रभु राम, माता सीता और लक्ष्मण जी सदैव ही आपके हृदय मैं वास करते हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा ।
विकट रूप धरि लंक जरावा ॥

अर्थ: आप सूक्ष्म रूप मैं सीता माता के सामने प्रकट हुए और विशाल रूप धारण करके लंका दहन किया।

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचंद्र के काज सवाँरे ॥

अर्थ: आपने भीष्म रूप धारण असुरों का संहार किया और प्रभु श्री राम के द्वारा दिया कार्य पूर्ण किया।

लाय सजीवन लखन जियाए ।
श्री रघुबीर हरषि उर लाए ॥

अर्थ: आप सुदूर स्थित संजीवनी बूटी लेकर आये और लक्ष्मण जी के प्राणो की रक्षा की और प्रभु श्री राम को हर्ष की अनुभूति करवाई।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई ॥

अर्थ: प्रभु श्री राम ने आपकी प्रशंसा करते हुए कहा कि आप उनके छोटे भाई भरत के सामान ही हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावै ।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ॥

अर्थ: हजारों लोग तुम्हारा यशगान करें ऐसा कहकर प्रभु श्री राम ने आपको अपने हृदय से लगा लिया।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥

अर्थ: समस्त ऋषि, महर्षि, देवगण, नारद जी, ब्रह्मा जी आदि आपका यशगान करते हैं।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते ॥

अर्थ: आपका यश ऐसा है कि यमराज, कुबेर, दसों दिशाओं की रक्षा करने वाले, कवि, विद्वान अथवा पंडित मिलकर भी आपके यश और कीर्ति का पूर्ण गुणगान नहीं कर सकते।

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा ।
राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥

अर्थ: अपने कपि राज सुग्रीव को प्रभु श्री राम से मिलवाकर उनपर बहुत उपकार किया जिससे वो अपने खोये राज्य को वापस पा सके।

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना ।
लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥

अर्थ: आपकी की ही बात मानकर विभीषण ने प्रभु श्री राम के कार्य मैं उनकी सहायता की, जिसके फलस्वरुप दुष्टों के संहार के बाद वो लंकापति बन पाए ये तो समस्त जग जानता है।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू ।
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू ॥

अर्थ: आप सूर्य को एक मीठा फल जानकर उसको खाने की मंशा से उस तक पहुँच गए जो एक जुग, एक सहत्र तथा एक योजन दूर स्थित है।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही ।
जलधि लाँघि गए अचरज नाही ॥

अर्थ: आप इतने बलशाली हैं की प्रभु श्री राम की अंगूठी को लेकर माता सीता की खोज मैं विशाल सागर को भी लाँघ गए इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥

अर्थ: संसार के दुष्कर से दुष्कर कार्य भी आपके स्मरण मात्र से ही आसानी से पूर्ण हो जाते हैं।

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे ॥

अर्थ: आप प्रभु श्री राम के द्वार के रक्षक हो और उनकी कृपा पाने के लिए, आपकी परीक्षा मैं उत्तीर्ण होने पर ही ये सौभग्य मिलता है।

सब सुख लहैं तुम्हारी सरना ।
तुम रक्षक काहु को डरना ॥

अर्थ: आपकी शरण मैं आने मात्र से ही कोई भी आनंद की प्राप्ति कर सकता है और जिसकी रक्षा स्वयं आप करते हो उसके सभी भय समाप्त हो जाते हैं।

आपन तेज सम्हारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तै कापै ॥

अर्थ: आपका तेज और वेग आपके सिवाय कोई भी नहीं संभाल सकता और आपकी एक हांक से ही तीनों लोक मैं कम्पन हो जाता है।

भूत पिशाच निकट नहि आवै ।
महावीर जब नाम सुनावै ॥

अर्थ: आपके नाम के सुमिरन मात्र से ही कोई भी आसुरी शक्ति, भूत और प्रेत बाधा किसी को परेशान करने का साहस भी नहीं कर सकती।

नासै रोग हरे सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥

अर्थ: आपके नाम के निरंतर जाप करने से रोग का नाश और पीड़ा का निवारण हो जाता है।

संकट तै हनुमान छुडावै ।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥

अर्थ: अपने मन मैं, कार्य मैं और वचन मैं जो भी आपका सुमिरन करता है उसके सभी संकटों को आप दूर कर देते हो।

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिनके काज सकल तुम साजा ॥

अर्थ: प्रभु श्री राम तपस्वी एवं श्रेष्ठ राजा हैं और आपकी उनके स्नेह को आतुर हो उनके सभी कार्यों को सहजता से पूर्ण करते हो।

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥

अर्थ: जो कोई भी श्रद्धा भाव से अपने मनोरथ करता है वो आपकी कृपा का पात्र बन जीवन मैं आपके आशीर्वाद स्वरूपी फल को प्राप्त करता है।

चारों जुग परताप तुम्हारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥

अर्थ: आपका यश और कीर्ति चरों युगों मैं फैली है और सम्पूर्ण जगत मैं आपके नाम का प्रकाश फैला हुआ है।

साधु संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ॥

अर्थ: आप प्रभु श्री राम के दुलारे हैं, साधु और संतो की रक्षा करते हैं और दुष्टो और असुरों का नाश करते।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥

अर्थ: माता जानकी के वरदान स्वरुप, आप ही आठ सिद्धियों और नौ निधियों के दाता हैं और आपकी कृपा से ही इन सिद्धियों और निधियों को प्राप्त किया जा सकता है।

राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥

अर्थ: आप सदैव ही प्रभु श्री राम के सान्निध्य मैं रहते हैं और इसलिए आपके पास ही राम रुपी औषधि है जो कष्ट और पीड़ा को हरने वाली है।

तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

अर्थ: आपके नाम का सुमिरन करने से प्रभु श्री राम के प्राप्त करने का रास्ता सुगम हो जाता है और जन्म जन्मांतर के दुखों से मुक्ति मिलती है।

अंतकाल रघुवरपुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥

अर्थ: आपको सुमिरन करने से जीवन को पूर्ण करने के बाद श्री रघुनाथ के धाम मैं आश्रय मिलता है और पुनर्जम के बाद भी हरि भक्ति का सौभाग्य प्राप्त होता है।

और देवता चित्त ना धरई ।
हनुमत सेई सर्व सुख करई ॥

अर्थ: आपकी भक्ति करने पर जो फल मिलता है वो किसी देवता को चित्त मैं धारण करने से कहीं ज्यादा गुणकारी है।

संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥

अर्थ: आपको सुमिरन करने मात्र से ही समस्त संकटों एवं पीड़ा का नाश हो जाता है।

जै जै जै हनुमान गुसाईँ ।
कृपा करहु गुरु देव की नाई ॥

अर्थ: हे हनुमान जी आपकी तीनों लोकों मैं जय हो और आपका आशीर्वाद मुझे गुरु के रूप मैं प्राप्त हो।

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

अर्थ: जो भी हनुमान चालीसा का नित्य सौ बार पाठ करेगा उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे और उसको आनंद की प्राप्ति होगी।

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा ।
होय सिद्ध साखी गौरीसा ॥

अर्थ: इस हनुमान चालीसा को पढ़ने मात्र से ही आपको अपने कार्यों मैं आशानुरूप परिणाम प्राप्त होने लगते हैं।

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥

अर्थ: तुलसीदास बताते हैं की वो प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त हैं और हनुमान जी से निवेदन कर रहे हैं कि वो उनके हृदय मैं निवास करें।

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥

अर्थ: इसी प्रकार हे संकट हरने वाले, सबका मंगल करने वाले पवन कुमार मैं आपसे अनुनय करता हूँ कि आप प्रभु श्री राम, माता सीता एवं लक्ष्मण जी के साथ मेरे ह्रदय मैं भी निवास करें।

सिया वर रामचंद्र कि जय।
पवनसुत हनुमान कि जय।


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हनुमान स्तुति (आरती), अर्थ सहित हिंदी मैं

॥ आरती ॥

“लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ॥”

आरती कीजै हनुमान लला की ।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
जाके बल से गिरवर काँपे ।
रोग-दोष जाके निकट न झांपे ॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई ।
संतन के प्रभु सदा सहाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥

दे बीरा रघुनाथ पठाए ।
लंका जारि सिय सुधि लाये ॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई ।
जात पवनसुत बार न लाई ॥
लंका जारि असुर संहारे ।
सियाराम जी के काज सँवारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥

लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे ।
आनि संजिवन प्राण उबारे ॥
पैठि पताल तोरि जमकारे ।
अहिरावण की भुजा उखारे ॥
बाएं भुजा असुर दल मारे ।
दाहिने भुजा संतजन तारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥

सुर-नर-मुनि जन आरती उतारें ।
जय जय जय हनुमान उचारें ॥
कंचन थार कपूर लौ छाई ।
आरती करत अंजना माई ॥
जो हनुमानजी की आरती गावे ।
बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥

॥ इति सम्पूर्णम ॥

आरती का अर्थ:

हे हनुमान जी, आपकी लाल वज्र जैसी देह ऊर्जा और तेजस्विता से भरपूर है. आप दुष्ट और दानवों का नाश करने वाले हो, हे कपि शूरवीर हम आपका जयगान करते हैं।

दुष्टों का नाश करने वाले प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान, जिसके बल से बड़े बड़े पहाड़ भी कांपने लगें। रोग, दोष जिसके निकट आने का साहस ना कर पाएं, जो संतों की सदैव सहयता करते हैं। माता अंजनी के ऐसे महावीर पुत्र को हम सभी प्रणाम करते हैं।

हे हनुमान जी आप प्रभु श्री राम के कहने मात्र से सीता माता की खोज के लिए लंका जाकर माता सीता की खबर ले आये। लंका विशाल समुद्र के बीच में स्थित थी, जहाँ तक पहुंचना असंभव समझा जाता था। पर ऐसे विशाल सागर को पार करने में भी अपने समय नहीं लगाया। लंका को जलाकर असुरों का संहार किया, और प्रभु श्रीराम का कार्य पूरा किया, अर्थात् सीता माता की खोज और उन तक संदेश पहुंचाने का कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया। हे हनुमानजी हम सब आपको प्रणाम करते हैं।

जब लक्ष्मण जी युद्ध के दौरान शक्ति लगने से मूर्छित होकर गए थे, तो आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की। आपने पाताल पुरी मैं जाकर न सिर्फ असुर सेना का संहार किया बल्कि अहिरावण जैसे महादैत्य को मृत्युलोक पहुंचा दिया। आप एक तरफ राक्षसों का संहार करते हैं वही दूसरी तरफ संतो की सहायता करते हैं। हे हनुमानजी हम सब आपको प्रणाम करते हैं।

हे हनुमानजी आपकी पूजा देवता, मनुष्य और मुनि सभी करते हैं और आपका जयगान करते हैं. आपका ऐसे महाप्रतापी हैं जिनकी आरती माता अंजनी सोने के थाल में कपूर की ज्योति जलाकर स्वयं करती हैं। जो कोई भी भक्त हनुमान जी की आरती गाता है वह बैकुंठ में निवास करता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। हे दुष्टों का नाश करने वाले प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान, हम सब आपको प्रणाम करते हैं।


रुद्राष्टकम्: संपूर्ण विवरण और अर्थ हिंदी मैं

रुद्राष्टकम् भगवान शिव की स्तुति में रचित एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान राम के अनन्य भक्त गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखा गया है। रुद्राष्टकम् में भगवान शिव के अद्वितीय स्वरूप, महिमा और कृपा का वर्णन किया गया है। आइए इस अद्भुत स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक का अर्थ और महत्ता समझते हैं।

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥

अर्थ: मैं उन ईश्वर को प्रणाम करता हूँ जो निर्वाण स्वरूप, सबके स्वामी, व्यापक, ब्रह्म और वेदों के स्वरूप हैं। जो स्वयं में स्थिर, निर्गुण, विकल्पहीन, इच्छा रहित और चिदाकाश (शुद्ध चेतना) रूप हैं तथा आकाश में निवास करते हैं।

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥

अर्थ: जो निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (चौथे अवस्था) हैं। जो वाणी और ज्ञान से परे, ईश्वरीय और पर्वतों के ईश्वर हैं। जो भयावह, महाकाल, काल के भी काल और कृपालु हैं। जो गुणों के भंडार और संसार के पार हैं, मैं उन्हें नमन करता हूँ।

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा
लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥

अर्थ: जो हिमालय के समान गौरवर्ण, गंभीर और करोड़ों कामदेवों की शोभा से युक्त हैं। जिनके मस्तक पर कल-कल करती सुंदर गंगा, मस्तक पर चमकता हुआ चंद्रमा और गले में सर्प शोभायमान हैं।

चलत्कुण्डलं भ्रू-सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥

अर्थ: जिनके कानों में झूमते कुंडल, सुंदर नेत्र, विशाल स्वरूप, प्रसन्न मुख, नीला कंठ और दयालु स्वभाव हैं। जो मृगचर्म धारण किए हुए हैं, मुंडमाल से सुशोभित हैं, प्रिय शंकर और सबके स्वामी हैं, मैं उनकी आराधना करता हूँ।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटि प्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥

अर्थ: जो प्रचंड, उत्कृष्ट, प्रबल, परमेश्वर, अखंड, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवान हैं। जो त्रिशूल धारण करने वाले, समस्त दुखों का नाश करने वाले, भवानीपति और भाव से समझे जाने वाले हैं, मैं उनकी भक्ति करता हूँ।

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी
सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥

अर्थ: जो काल से परे, कल्याणकारी, कल्पांत को लाने वाले, सदा सत्य-चेतन-आनंद के दाता, पुरारी (त्रिपुरासुर का संहार करने वाले), चिदानंद के स्वरूप और मोह को नष्ट करने वाले हैं। हे मन्मथ (कामदेव) के शत्रु, मुझ पर प्रसन्न होइए।

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शांति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्व भूताधिवासं॥

अर्थ: जब तक मनुष्य हे उमानाथ, आपके चरणकमलों की भक्ति नहीं करते, तब तक उन्हें इस लोक में या परलोक में न सुख, न शांति, न संताप का नाश मिलता है। हे सर्वभूतों के वासी प्रभु, मुझ पर कृपा कीजिए।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जराजन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥

अर्थ: मैं न योग जानता हूँ, न जप, न ही पूजा। मैं सदा सर्वदा आपके ही समर्पित हूँ। जन्म और जरा (बुढ़ापा) के दुखों से पीड़ित हूँ। हे प्रभु शंभु, मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये
ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति।।

अर्थ: जो भी मनुष्य इस स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर भोलेनाथ विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं।

रुद्राष्टकम् भगवान शिव की महिमा और उनकी दिव्यता का सुंदर वर्णन है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के मन में शांति, भक्ति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र न केवल भगवान शिव की स्तुति करता है बल्कि उनके विभिन्न गुणों और स्वरूपों का भी वर्णन करता है, जो शिव भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। नियमित रूप से रुद्राष्टकम् का पाठ करने से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं और उसे आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है।


डिस्क्लेमर: इस लेख मैं दी गयी जानकारी की सटीकता की हम गारंटी नहीं देते, ये लेख विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों अथवा पुस्तकों से संगृहीत कर के आप तक पहुँचाया गया है, हमारा उद्देश्य आप तक सूचना पहुँचाना मात्र है, इसलिए किसी भी त्रुटि सुधार के लिए सम्बंधित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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संकटमोचन हनुमान अष्टक: अर्थ सहित हिंदी मैं

संकटमोचन हनुमान अष्टक एक प्रमुख भक्तिमय स्तोत्र है जो भगवान हनुमान की स्तुति में लिखा गया है। यह स्तोत्र भगवान हनुमान की महिमा का गुणगान करता है और विभिन्न संकटों से मुक्ति पाने के लिए इसका पाठ किया जाता है। यह हनुमान जी की शक्ति, साहस, और समर्पण को दर्शाता है। संकटमोचन हनुमान अष्टक सुनने के लिए लिंक पर क्लिक करें।

संकटमोचन हनुमान अष्टक

बाल समय रवि भक्षि लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारों ।
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो ।।
देवन आनि करी बिनती तब, छाड़ी दियो रवि कष्ट निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।।

अर्थ: इस श्लोक में हनुमान जी की बाल्यावस्था में की गई अद्भुत लीला और उनके संकटमोचन स्वरूप का वर्णन है जिसमे उन्होंने सूर्य को फल समझ कर निगल लिया था और समस्त लोकों मैं अँधेरा छा गया था और देवताओं के अनुनय विनय के बाद ही सूर्य को वापस निकला था। उनकी इस लीला ने यह सिद्ध कर दिया कि वे किसी भी प्रकार के संकट को दूर करने में सक्षम हैं और इस कारण उन्हें ‘संकटमोचन’ कहा जाता है।

बालि की त्रास कपीस बसैं गिरि, जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महामुनि साप दियो तब, चाहिए कौन बिचार बिचारो ।।
कैद्विज रूप लिवाय महाप्रभु,सो तुम दास के सोक निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।।

अर्थ: इस श्लोक में हनुमान जी की महानता और उनकी भक्ति को दर्शाया गया है। हनुमान जी ने सुग्रीव को बालि के भय से मुक्त कराकर उनकी सहायता की और श्रीराम की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया। हनुमान जी के इस अद्भुत सेवा भाव और संकट निवारण के कारण उनका नाम ‘संकटमोचन’ पड़ा, जिसे पूरे जगत में जाना जाता है।

अंगद के संग लेन गए सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत न बचिहौ हम सो जु, बिना सुधि लाये इहाँ पगु धारो ।।
हेरी थके तट सिन्धु सबे तब, लाए सिया-सुधि प्राण उबारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।।

अर्थ: इस श्लोक में हनुमान जी की दृढ़ संकल्प और भक्ति का वर्णन किया गया है। जब सीता माता को रावण ने हरण कर लिया था, तो हनुमान जी अंगद के साथ उनकी खोज में निकले। उन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि जब तक वे सीता माता की सही खबर नहीं लाएंगे, वे जीवित वापस नहीं आएंगे। इस प्रतिज्ञा और भक्ति की वजह से उन्होंने समुद्र पार करके लंका में प्रवेश किया और सीता माता का पता लगाया। उनके इस अद्वितीय प्रयास से सभी वानरों के प्राण बच गए और वे वापस प्रभु श्रीराम के पास लौट सके। हनुमान जी का यह साहस और निष्ठा उन्हें ‘संकटमोचन’ बनाता है, जो सभी संकटों को हरने वाले हैं।

रावण त्रास दई सिय को सब, राक्षसी सों कही सोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाए महा रजनीचर मारो ।।
चाहत सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभुमुद्रिका सोक निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।।

अर्थ: इस श्लोक में हनुमान जी की वीरता और उनकी भक्ति का वर्णन किया गया है। रावण के द्वारा सीता माता को कष्ट दिए जाने पर हनुमान जी ने राक्षसियों को डराया और उनके दु:ख को दूर किया। उन्होंने महान राक्षसों का वध किया और जब सीता माता अशोक वाटिका में आत्मदाह करने का विचार कर रही थीं, तब हनुमान जी ने उन्हें श्रीराम की अंगूठी देकर उनके दु:ख को दूर किया। हनुमान जी के इस अद्भुत कार्यों के कारण उन्हें ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, जो सभी संकटों का निवारण करने वाले हैं।

बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सुत रावण मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोण सुबीर उपारो ।।
आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।।

अर्थ: यह श्लोक हनुमान जी की वीरता, भक्ति और निष्ठा को दर्शाता है। जब लक्ष्मण जी रावण के पुत्र मेघनाद के बाण से गंभीर रूप से घायल हो गए, तो हनुमान जी ने वैद्य सुषेण को लाकर और द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की। हनुमान जी का यह अद्वितीय कार्य उन्हें ‘संकटमोचन’ के नाम से विख्यात बनाता है, जो सभी संकटों को हरने वाले हैं।

रावन युद्ध अजान कियो तब, नाग कि फांस सबै सिर डारो ।
श्री रघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो ।।
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।।

अर्थ: यह श्लोक हनुमान जी के अद्वितीय साहस और उनकी संकटमोचन क्षमता को दर्शाता है। जब रावण ने युद्ध में जादू का प्रयोग कर नाग पाश से श्रीराम और उनकी सेना को बांध दिया, तो सभी योद्धा संकटग्रस्त हो गए। हनुमान जी ने तत्काल गरुड़ देव को बुलाकर नाग पाश का बंधन काटकर सभी का भय दूर किया। हनुमान जी का यह कार्य उन्हें ‘संकटमोचन’ के रूप में प्रसिद्ध करता है, जो सभी संकटों का निवारण करने वाले हैं।

बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रघुनाथ पताल सिधारो ।
देबिन्हीं पूजि भली विधि सों बलि, देउ सबै मिलि मन्त्र विचारो ।।
जाये सहाए भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत संहारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।।

अर्थ: इस श्लोक में हनुमान जी की वीरता और उनकी संकटमोचन शक्ति का वर्णन किया गया है। जब भी कोई बड़ा संकट आता है, हनुमान जी अपनी अद्वितीय शक्ति और भक्ति से उस संकट को दूर करते हैं। जैसे जब अहिरावण जब प्रभु श्री राम और लक्ष्मण जी को उठाकर पटल लोक मैं उनकी बलि देने के ले गया था तो उन्होंने अहिरावण और उसकी समस्त सेना का संहार कर दिया थाइसी कारण उन्हें ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, और उनकी महानता संपूर्ण जगत में प्रसिद्ध है।

काज किये बड़ देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसो नहिं जात है टारो ।।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होए हमारो ।
को नहीं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ।।

अर्थ: इस श्लोक में हनुमान जी की महानता और उनकी शक्ति का बखान किया गया है। हनुमान जी को संकटमोचन के रूप में मान्यता दी गई है, क्योंकि वे किसी भी संकट को दूर करने में सक्षम हैं। श्लोक में यह भी कहा गया है कि हनुमान जी ने देवताओं के भी बड़े-बड़े कार्य किए हैं, और उनसे कोई भी संकट ऐसा नहीं है जो दूर नहीं हो सकता। इसीलिए, भक्तों की प्रार्थना होती है कि हनुमान जी उनके सभी संकटों को शीघ्रता से दूर करें।

इसलिए हे हनुमान जी इस जग में कौन नहीं जानता कि आप ही का नाम ‘संकटमोचन’ है।

हनुमान अष्टक पढ़ने के लाभ: हनुमान अष्टक पढ़ने के कई लाभ हैं, जो शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और भावनात्मक रूप से लाभदायक हो सकते हैं। हनुमान अष्टक हनुमान जी की स्तुति में रचित एक प्रार्थना है, जो उनकी कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गाई जाती है। इसके फायदे निम्नलिखित हो सकते हैं:

  1. संकटों का निवारण: हनुमान अष्टक पढ़ने से जीवन के विभिन्न संकटों और समस्याओं का निवारण होता है। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, और उनकी कृपा से जीवन के कठिन समय में सहारा मिलता है।
  2. मानसिक शांति: नियमित रूप से हनुमान अष्टक का पाठ करने से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है। यह मन को शांत और स्थिर रखता है, और तनाव व चिंता को कम करता है।
  3. शारीरिक स्वास्थ्य: हनुमान जी की स्तुति करने से शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। इससे ऊर्जा और शक्ति की प्राप्ति होती है, और बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है।
  4. आध्यात्मिक उन्नति: हनुमान अष्टक का पाठ करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह भक्ति और ध्यान को बढ़ावा देता है, और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
  5. आत्मविश्वास और साहस: हनुमान जी की उपासना करने से आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि होती है। यह हमें कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति और धैर्य प्रदान करता है।
  6. सकारात्मकता का संचार: हनुमान अष्टक पढ़ने से जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है। यह नकारात्मक विचारों को दूर करता है और जीवन में नई ऊर्जा और उमंग भरता है।
  7. सभी प्रकार के भय का नाश: हनुमान जी को भयभंजन भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे सभी प्रकार के भय को नष्ट करते हैं। हनुमान अष्टक का पाठ करने से भय और आशंका से मुक्ति मिलती है।
संकटमोचन हनुमान अष्टक

हनुमान अष्टक का नियमित पाठ करने से हनुमान जी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का संचार होता है।

Additional Info..


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जन्माष्टमी (Janmashtami) 2024: भव्यता व दिव्यता से जगमगा उठेगी कान्हा की नगरी, श्रद्धालुओं का मन हो उठेगा रोमांचित..

तीर्थनगरी मथुरा मैं इस बार धूमधाम से मनाई जाएगी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, होंगे रंगारंग कार्यक्रम जगह जगह पर लगेंगे भंडारे।

लीलाधर भगवान श्रीकृष्ण जिनको बृजवासी प्यार से कान्हा बुलाते हैं, का जन्मोत्सव उनकी जन्मस्थली मथुरा के साथ बृज क्षेत्र के सभी प्रमुख स्थलों पर धूमधाम से मनाया जाएगा। इसमें मथुरा-वृंदावन के तिराहे-चौराहे, घाट और 23 प्रमुख मंदिरों को विधुत प्रकाश से सजाया जाएगा। जगह-जगह सेल्फी पॉइंट और मंच बनाए जाएंगे। मंचों पर ब्रज, राजस्थान, गुजराज, महाराष्ट्र के कलाकार कला सांस्कृतिक छटा बिखेंरेंगे। पूरा बृज मंडल भक्ति और प्रेम मैं सरोबार हो अपने कान्हा का जन्मोस्तव हर घर मैं सजावट कर और पकवान बना कर धूमधाम से मनाएगा।

उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद इस बार तीन दिवसीय 25 से 27 अगस्त तक ब्रज में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव बहुत बड़े स्तर पर मनाएगा। इसे भव्य और दिव्य बनाने के लिए पूरा विचार विमर्श किया जा चुका है। इस बार जन्माष्टमी पर पांच मुख्य मंचन बनाए जाएंगे। इनमें जुबली पार्क, श्रीकृष्ण जन्मस्थान लीला मंच, वृंदावन में गीता शोध संस्थान, परासौली स्थित चंद्र सरोवर हैं। यहां सांस्कृतिक काय्रक्रमों के साथ भजन गायन, लोक गायन एवं रसिया गायन, रासलीला एवं नृत्य होगा।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण जन्मस्थान एवं द्वारिकाधीश मंदिर सहित ब्रज के 23 प्रमुख मंदिरों को झालरों एवं रंगबिरंगी लाइटों से सजाया जाएगा। इन मंदिरों को सजाने का जिम्मेदारी मंदिर प्रबंधन की है। सजने वाले मंदिरों में मथुरा के साथ-साथ वृंदावन, बरसाना, नंदगांव, दाऊजी, गोवर्धन, महावन, छटीकरा एवं मार्ग के अन्य मंदिर भी शामिल हैं। साथ ही छोटे बड़े सामाजिक समूह भी अपने अपने स्तर पर अपने आसपास के मंदिरों को सजायेंगे और जगह जगह भंडारों का आयोजन भी किया जायेगा जिसमे भांति भांति के पकवान प्रसाद स्वरुप श्रद्धालुओं को खिलाये जायेंगे।

इन स्थानों पर बनेंगे छोटे मंच..

कृष्णपुरी तिराहा, पोतरा कुंड, महाविद्या चौराहा, श्रीकृष्ण जन्मभूमि के गेट तीन के सामने, मसानी मुकुंद विहार के पास, डीग गेट सब्जी मंडी, भूतेश्वर तिराहा, रेलवे स्टेशन मालगोदाम रोड, बीएसए कॉलेज रोड पर बैंक के सामने, नया बस अड्डा, गोवर्धन चौराहा, गोवर्धन थाने के पास, जय गुरुदेव मंदिर के पास, धौलीप्याऊ, भांडीर वन, बल्देव में मंदिर के पास, गोकुल में मंदिर पास, महावन चौरासी खंबा मंदिर, नंदगांव रंगीली चौक आदि पर छोटे मंच बनाये जायेंगे जहाँ लीलाधर की लीलाओं का मंचन किया जायेगा।

मथुरा-वृंदावन के इन प्रमुख चौराहों पर होगी भव्य सजावट..

कृष्णापुरी तिराहा, लक्ष्मी नगर तिराहा, स्टेट बैंक चौराहा, भूतेश्वर तिराहा, डीग गेट तिराहा, मसानी चौराहा, पोतरा कुंड तिराहा, भरतपुर गेट चौराहा, डेंपियर नगर चौराहा, गोवर्धन चौराहा, विद्यापीट चौराहा, अटल्ला चुंगी चौराहा, कल्याण करोति तिराहा, होलीगेट चौराहा आदि पर भव्य सजावट की जाएगी।

इन घाटों पर होगी भव्य सजावट..

वृंदावन के केशीघाट, गोकुल के ठकुरानी घाट, मथुरा के विश्राम घाट पर बिजली की लाइटें लगाकर जगमग प्रकाश की सजावट की जाएगी।

बनेंगे सेल्फी पॉइंट..

पोतरा कुंड के पास, महाविद्या चौराहा, श्रीकृ ष्ण जन्मभूमि गेट नं-3, मसानी चौराहा, भरतपुर गेट चौराहा, जन्मभूमि मार्ग पेट्रोल पंप के पास, कल्याण करोति के पास, नए बस स्टैंड पर, स्टेट बैंक चौराहा, माल गोदाम रोड, धौलीप्याऊ, बीएसए कॉलेज के पास, भूतेश्वर तिराहा, फायर स्टेशन के पास जलकल कार्यालय, गोवर्धन चौराह पुल के नीचे, टीएफसी वृंदावन, रसखान समाधि स्थल।

बृज मंडल मैं आने वाले सभी श्रद्धालुओं के साथ ही आम जनमानस को समस्या न हो इसके लिए ट्रैफिक को जगह जगह रोकने और डाइवर्ट करने का पूरा प्रबंध प्रशासन ने कर लिया है, जिससे भक्तजन बिना किसी व्यवधान के कान्हा के जन्मोत्सव की पूरा आनंद उठा पाएं।


गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima): अपने गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान का पर्व..

गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णुः, गुरुर देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥

गुरु ब्रह्मा हैं (सृष्टिकर्ता), गुरु विष्णु हैं (पालनहार), गुरु महेश्वर हैं (विध्वंसक)। गुरु वास्तव में परमब्रह्म हैं; ऐसे पूज्य गुरु को मेरा नमन।

गुरु पूर्णिमा (Guru Purnima), भारत में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो गुरुओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए समर्पित है। यह त्योहार आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है, और इस दिन को महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया था और महाभारत की रचना भी की थी। इस ब्लॉग में हम गुरु पूर्णिमा के महत्व, इसकी पूजा विधि, और इस पर्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

गुरु पूर्णिमा का महत्व

गुरु पूर्णिमा का महत्व भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में गहराई से निहित है। गुरु शब्द संस्कृत के “गु” और “रु” से बना है, जहां “गु” का अर्थ अंधकार और “रु” का अर्थ प्रकाश होता है। इस प्रकार, गुरु वह होता है जो अपने शिष्यों के जीवन से अज्ञानता के अंधकार को दूर करता है और उन्हें ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर करता है।

इस दिन को महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, जो वेदों के संकलनकर्ता और महाभारत के लेखक थे। उन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित किया और पुराणों की भी रचना की। वेदव्यास को आदि गुरु माना जाता है और उनकी शिक्षाओं का भारतीय संस्कृति में अत्यधिक महत्व है।

गुरु पूर्णिमा की पूजा विधि

गुरु पूर्णिमा के दिन लोग अपने गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा करते हैं। इस दिन की पूजा विधि इस प्रकार है:

  1. स्नान और शुद्धि: प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  2. गुरु की प्रतिमा या चित्र: पूजा स्थल पर गुरु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. आरती और मंत्र: गुरु की आरती करें और गुरु मंत्र का जाप करें।
  4. फूल और माला: गुरु को फूल और माला अर्पित करें।
  5. प्रसाद: पूजा के बाद प्रसाद वितरित करें।
  6. गुरु का आशीर्वाद: गुरु के चरणों में जाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।

गुरु पूर्णिमा के पर्व का आयोजन

गुरु पूर्णिमा का पर्व विभिन्न शैक्षिक और धार्मिक संस्थानों में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जिनमें प्रवचन, भजन-कीर्तन, और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होते हैं। लोग अपने गुरुओं को उपहार देते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

गुरु पूर्णिमा के पर्व से जुड़े अनुशासन

गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य अपने गुरु के प्रति अपनी निष्ठा और अनुशासन का प्रदर्शन करते हैं। वे इस दिन व्रत रखते हैं और अपने गुरु की शिक्षाओं का पालन करने का संकल्प लेते हैं। यह दिन शिष्यों के लिए आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि का भी दिन होता है।

गुरु पूर्णिमा के पर्व का आध्यात्मिक महत्व

गुरु पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व अत्यधिक है। यह दिन शिष्यों को अपने गुरु की शिक्षाओं के प्रति प्रतिबद्धता और श्रद्धा प्रकट करने का अवसर देता है। यह पर्व हमें यह याद दिलाता है कि हमारे जीवन में ज्ञान और मार्गदर्शन के महत्व को समझना और उसका आदर करना चाहिए।

उपसंहार

गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जो हमें हमारे गुरुओं के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर देता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस दिन की पूजा विधि, अनुशासन, और आध्यात्मिक महत्व को समझते हुए, हमें अपने जीवन में गुरुओं की भूमिका को स्वीकार करना चाहिए और उनके प्रति अपनी निष्ठा और सम्मान प्रकट करना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें यह सिखाता है कि ज्ञान का महत्व कितना महत्वपूर्ण है और हमें अपने गुरुओं का आदर और सम्मान करना चाहिए। इस दिन को समर्पण, श्रद्धा, और अनुशासन के साथ मनाना चाहिए और अपने गुरुओं के आशीर्वाद से अपने जीवन को संवारना चाहिए।