Hanuman Ashtak के पाठ से क्यों प्रसन्न होते हैं प्रभु श्री राम

हनुमान जी को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में सबसे बड़े भक्त और पराक्रमी देवता माना जाता है। वे भगवान शिव के रुद्रावतार और श्रीराम के परम भक्त हैं। उन्हें पवनपुत्र, अंजनीसुत, बजरंगबली, और महावीर जैसे अनेक नामों से पुकारा जाता है। हनुमान जी के अनेक स्तोत्र, चालीसा और भजन हैं, जिनका पाठ करने से अपार फल प्राप्त होता है। इन्हीं में से एक है हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak), जिसे विशेष रूप से भक्त अपने जीवन की कठिनाइयों और भय को दूर करने के लिए पढ़ते हैं।

Hanuman Ashtak क्या है?

‘अष्टक’ का अर्थ होता है – आठ श्लोकों का स्तोत्र। हनुमान अष्टक आठ पदों में हनुमान जी की महिमा और उनकी शक्ति का गुणगान करता है। इसका पाठ तुलसीदास जी द्वारा रचित माना जाता है। इसमें हनुमान जी को रामभक्ति का अद्वितीय स्वरूप, भय और संकटों के नाशक तथा भक्तों के उद्धारक के रूप में वर्णित किया गया है।

Hanuman Ashtak का महत्व

  1. संकट मोचन – मान्यता है कि हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak) का नित्य पाठ करने से जीवन के सभी संकट दूर हो जाते हैं।
  2. भय का नाश – यह स्तोत्र विशेष रूप से भय, दुःस्वप्न और मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है।
  3. साहस और आत्मविश्वास – हनुमान जी का स्मरण करने से मनुष्य में असीम शक्ति और आत्मबल का संचार होता है।
  4. दुष्ट शक्तियों से रक्षा – मान्यता है कि यह अष्टक भूत-प्रेत, बाधा और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है।

क्यों Hanuman Ashtak के पाठ से प्रसन्न होते हैं प्रभु श्रीराम?

  1. रामभक्ति के सच्चे सेतु हैं हनुमान जी
    तुलसीदास जी ने स्वयं लिखा है कि “राम दुआरे तुम रखवारे” — यानी हनुमान जी के बिना प्रभु राम तक पहुँचना कठिन है। जब कोई भक्त हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak) का पाठ करता है, तो वह सीधे-सीधे श्रीराम की भक्ति का मार्ग खोल देता है। इस कारण श्रीराम हर्षित होते हैं।
  2. हनुमान जी रामकाज के प्रतीक हैं
    हनुमान अष्टक में हनुमान जी के बल, साहस और संकटमोचन स्वरूप की स्तुति है। यह वही गुण हैं जिनसे उन्होंने रामकाज सिद्ध किया—सीता माता की खोज, लंका दहन, लक्ष्मण जी को जीवित करना। अतः जब कोई भक्त यह पाठ करता है तो अप्रत्यक्ष रूप से वह प्रभु राम की ही महिमा का गान करता है।
  3. हनुमान जी को प्रसन्न करना मतलब राम को प्रसन्न करना
    श्रीराम ने स्वयं हनुमान जी को “अपना सबसे प्रिय भक्त और मित्र” कहा है। जब कोई भक्त हनुमान जी की स्तुति करता है, तो भगवान राम को अपने प्रिय भक्त की महिमा गाई जाती प्रतीत होती है। इससे वे आनंदित होते हैं।
  4. भक्ति और समर्पण की शक्ति
    हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak) के हर श्लोक में संकटों से मुक्ति और निर्भयता की भावना है। यह सब प्रभु राम की शक्ति से ही संभव हुआ। इसलिए यह पाठ हनुमान जी के साथ-साथ रामभक्ति को भी पुष्ट करता है।

Hanuman Ashtak पाठ करने का सही समय और विधि

  • प्रातःकाल स्नान कर के शुद्ध वस्त्र पहनें।
  • हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
  • लाल चंदन और सिंदूर का तिलक करें तथा प्रसाद (गुड़, चना) अर्पित करें।
  • बैठकर श्रद्धा और भक्ति से हनुमान अष्टक का पाठ करें।
  • पाठ के बाद “जय हनुमान” का कीर्तन अवश्य करें।

तुलसीदास जी ने Hanuman Ashtak की रचना क्यों की?

तुलसीदास जी, जो रामचरितमानस के रचयिता भी हैं, हनुमानजी को भगवान राम का सबसे प्रिय और शक्तिशाली सेवक मानते थे। उनके जीवन में कई ऐसे अवसर आए जब वे कठिनाइयों में घिर गए। सामाजिक विरोध, आध्यात्मिक बाधाएँ और व्यक्तिगत संघर्ष — इन सबमें उन्हें हनुमानजी का दिव्य सहारा मिला।

इसी अनुभव ने तुलसीदास जी को यह प्रेरणा दी कि वे हनुमानजी की महिमा का वर्णन आठ श्लोकों में करें, ताकि जन-जन तक यह संदेश पहुँचे कि हनुमानजी की भक्ति से हर समस्या दूर हो सकती है।

  • तुलसीदास जी के लिए हनुमानजी संकटमोचन और रामभक्ति का आधार थे।
  • वे चाहते थे कि हर भक्त आसानी से यह स्तोत्र याद कर सके और हनुमानजी की कृपा प्राप्त करे।
  • इसीलिए उन्होंने सरल भाषा में हनुमान अष्टक (Hanuman Ashtak) लिखा, जो आज भी उतना ही प्रभावशाली है जितना उनके समय में था।

हनुमान जी की महिमा

हनुमान जी का स्वरूप हमें भक्ति, शक्ति, बुद्धि और विनम्रता का अद्वितीय संगम सिखाता है।

  • वे बाल्यकाल से ही अपार बल और अद्भुत तेज के धनी रहे।
  • लंका दहन, संजीवनी बूटी लाना और रामायण के युद्ध में उनके अदम्य पराक्रम ने उन्हें देवताओं में भी श्रेष्ठ बना दिया।
  • माना जाता है कि कलियुग में हनुमान जी ही ऐसे देव हैं, जिनकी पूजा और स्मरण से तुरंत फल प्राप्त होता है।

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भारत के 11 प्रसिद्ध हनुमान मंदिर, जिनके दर्शन अवश्य करने चाहिए

सात चिरंजीवियों मैं से एक और माता अंजनी एवं वानरराज केसरी के पुत्र और प्रबल प्रतापी श्री हनुमानजी जिनको संकटमोचन, बजरंगबली, मारुतिनंदन, पवनपुत्र आदि अन्य नामों से भी सम्बोधित किया जाता है को कौन नहीं जानता। देवाधिदेव महादेव शंकर के अवतार और भगवन श्री राम के अनन्य भक्त श्री हनुमान जी का रामायण मैं योगदान और प्रभु श्रीराम के प्रति उनकी भक्ति दुर्लभ ही देखने को मिलेगी।

हनुमान जी को उनकी अद्भुत शक्ति, भक्ति और समर्पण के लिए पूजा जाता है। भारतीय संस्कृति में हनुमान जी को शक्ति, साहस और निष्ठा का प्रतीक माना जाता है। भारत के कोने-कोने में भगवान हनुमान के अनगिनत मंदिर स्थित हैं, जिनमें से कुछ अपनी ऐतिहासिकता, वास्तुकला और आस्था के लिए अद्वितीय हैं।

इस लेख में हम ऐसे ही प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों की जानकारी देंगे, जो हर भक्त को कम से कम एक बार दर्शन जरूर करने चाहिए।

1. श्री हनुमान गढ़ी, अयोध्या-उत्तर प्रदेश

यह मंदिर उस स्थान पर स्थित है, जहाँ हनुमान जी ने भगवान राम की सेवा में अपने जीवन को समर्पित किया था। जब रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद भगवान राम अयोध्या लौटे, तो हनुमानजी यहां रहने लगे। इसीलिए इसका नाम हनुमानगढ़ या हनुमान कोट रखा गया। यहीं से हनुमानजी रामकोट की रक्षा करते हैं। इसलिए यह स्थल हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और बल का प्रतीक माना जाता है।

मुख्य आकर्षण:

  • अयोध्या के मध्य में स्थित, 76 सीढ़ियाँ हनुमानगढ़ी तक जाती हैं।
  • मुख्य मंदिर मैं हनुमान जी बाल्यावस्था मैं माता अंजनी की गोद मैं बैठे हुए हैं।
  • अयोध्या के कोतवाल होने के कारण, यहाँ प्रथा है कि राम मंदिर जाने से पहले सबसे पहले भगवान हनुमान मंदिर के दर्शन करने चाहिए।
  • चोला चढ़ाने से व्‍यक्ति को मिलती है दोष से मुक्ति।

2. संकट मोचन हनुमान मंदिर, वाराणसी-उत्तर प्रदेश

वाराणसी का संकट मोचन हनुमान मंदिर तुलसीदास जी द्वारा स्थापित किया गया था। यह मंदिर गंगा नदी के किनारे स्थित है और वाराणसी की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। इस मंदिर में भगवान हनुमान की पूजा संकटमोचन रूप में की जाती है, जो भक्तों के सभी संकट दूर करते हैं।

मुख्य आकर्षण:

  • मंदिर के गर्भगृह में सिंदूर से लिपटी हनुमान जी की मूर्ति है।
  • इस मंदिर में जागृत अवस्था में हनुमान जी को माना जाता है।
  • हर मंगलवार और शनिवार को सुंदरकांड और हनुमान चालीसा का विशेष पाठ होता है।
  • इस मंदिर में चढ़ाए जाने वाले लड्डू बहुत मशहूर हैं।
  • नवरात्रि और हनुमान जयंती पर विशेष आयोजन होता है।

3. प्राचीन हनुमान मंदिर, कनाट प्लेस-दिल्ली

दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में स्थित यह मंदिर भारत के सबसे प्राचीन हनुमान मंदिरों में से एक है। कहा जाता है कि यह मंदिर महाभारत काल से अस्तित्व में है। मान्यता अनुसार प्रसिद्ध भक्तिकालीन संत तुलसीदास जी ने दिल्ली यात्रा के समय इस मंदिर में भी दर्शन किये थे। उन्होंने इस स्थल पर ही हनुमान चालीसा की रचना की थी।

मुख्य आकर्षण:

  • हनुमान जी की मूर्ति पर सिंदूर का विशेष लेप किया जाता है।
  • भक्तों को यहां अमरफल (चिरंजीवी होने का आशीर्वाद) का प्रतीक नारियल प्रसाद स्वरूप मिलता है।
  • मंदिर की छत पर स्थित “श्रीराम” लिखा हुआ चक्र भक्तों के लिए एक बड़ा आकर्षण है।

4. महावीर मंदिर, पटना-बिहार

महावीर मंदिर, पटना के हृदय में स्थित बिहार का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। पटना जंक्शन के समीप स्थित महावीर मंदिर, भारत के प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में से एक है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सामाजिक सेवा के लिए भी प्रसिद्ध है। यह बिहार का एक प्रमुख तीर्थस्थल है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान हनुमान का आशीर्वाद लेने आते हैं।

मुख्य आकर्षण:

  • यहां भगवान हनुमान की दो युग्म प्रतिमाएं हैं।
  • एक प्रतिमा मनोकामना पूर्ण करती है तो दूसरी सभी कष्टों का हरण करती है।
  • यहां का प्रसाद नैवेद्यम पूरे देश में प्रसिद्ध है।
  • हनुमान जयंती के अवसर पर विशेष पूजा और भंडारे का आयोजन होता है।
  • मंदिर परिसर में संचालित अस्पताल और कैंसर शोध केंद्र सामाजिक सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • यहाँ हनुमान जी के दर्शन के लिए हर दिन हजारों भक्त आते हैं।

5. सालासर बालाजी मंदिर, चुरूराजस्थान

राजस्थान के चुरू जिले में स्थित सालासर बालाजी मंदिर का महत्व पूरे भारत में है। यह मंदिर अपनी विशिष्ट मूर्ति और यहाँ पूरी होने वाली मनोकामनाओं के लिए जाना जाता है। यह माना जाता है कि बालाजी महाराज अपने भक्तों की हर समस्या का समाधान करते हैं।

मुख्य आकर्षण:

  • हनुमान जी की मूर्ति में मूंछ और दाढ़ी का विशेष चित्रण किया गया है।
  • भक्त लाल धागा चढ़ाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति की कामना करते हैं।
  • हर साल भाद्रपद और चैत्र में आयोजित होने वाले मेले में लाखों श्रद्धालु आते हैं।
  • यहां चढ़ाए गए नारियलों का दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें खेत में गड्ढा खोदकर दबा दिया जाता है।
  • मंदिर के पास कई धर्मशालाएं और भोजनालय हैं, जहां भक्तों को नि:शुल्क सेवा प्रदान की जाती है।

6. मेहंदीपुर बालाजी, दौसाराजस्थान

जयपुर और दौसा जिले के बीच स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर को भारत का सबसे रहस्यमय मंदिर माना जाता है। यह मंदिर मानसिक और शारीरिक समस्याओं से मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर दो पहाड़ियों के बीच बना है और इसे घाटा मेहंदीपुर भी कहा जाता है।

मुख्य आकर्षण:

  • यहाँ आने वाले भक्त विशेष पूजा और हवन के माध्यम से नकारात्मक ऊर्जा से छुटकारा पाने की प्रार्थना करते हैं।
  • यहाँ प्रसाद में लड्डू मिलता है जिसे वहीं खाने की परंपरा है।
  • यहां तीन देवों की पूजा की जाती है – श्री बालाजी महाराज, श्री प्रेतराज सरकार, और श्री कोतवाल (भैरव बाबा )।
  • इस मंदिर में हनुमान जी की बाल रूप मूर्ति है, जो किसी कलाकार ने नहीं बनाई है, बल्कि यह स्वयंभू है।

7. हनुमान धारा मंदिर, चित्रकूट-उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित चित्रकूट अपने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थित हनुमान धारा मंदिर श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक अनूठा स्थल है। यह मंदिर भगवान हनुमान को समर्पित है और रामायण काल की घटनाओं से जुड़ा हुआ है।

मुख्य आकर्षण:

  • जब भगवान हनुमान ने लंका दहन के बाद श्रीराम की सेवा की, तो उनकी पूंछ में लगी अग्नि को शांत करने के लिए भगवान श्रीराम ने इस स्थान पर जलधारा का सृजन किया।
  • इस पवित्र धारा का जल आज भी बिना किसी बाहरी स्रोत के प्रवाहित होता है, जिसे चमत्कारिक और पवित्र माना जाता है।
  • ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों के बीच है, जहां से प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत नजारा देखने को मिलता है।

8. पंचमुखी हनुमान मंदिर, रामेश्वरम-तमिलनाडु

श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित एक मंदिर है, जो भगवान हनुमान को समर्पित है। यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला और तैरते पत्थरों की उपस्थिति के लिए जाना जाता है, जिनके बारे में कहा जाता है कि इनका इस्तेमाल भारत को श्रीलंका से जोड़ने वाले राम सेतु पुल के निर्माण में किया गया था।

मुख्य आकर्षण:

  • मंदिर मैं मौजूद भगवान हनुमान की पंचमुखी प्रतिमा उनकी शक्ति और वीरता को दर्शाती है।
  • मंदिर परिसर मैं मौजूद पत्थर पानी पर तैरते रहते हैं।
  • माना जाता है कि यह मंदिर करीब 500 साल पुराना है और इसे हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल माना जाता है।

9. बागेश्वर धाम बालाजी मंदिर, छतरपुर-मध्य प्रदेश

बागेश्वर धाम बालाजी मंदिर, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित, भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। यह स्थान भगवान हनुमान को समर्पित है और यहां देशभर से लाखों श्रद्धालु अपनी समस्याओं के समाधान और आध्यात्मिक शांति के लिए आते हैं।

मुख्य आकर्षण:

  • यहां आने वाले श्रद्धालु अपनी समस्याओं के समाधान के लिए “पर्ची” में लिखकर प्रार्थना करते हैं। यह विश्वास है कि उनकी हर मनोकामना भगवान हनुमान की कृपा से पूरी होती है।
  • मंगलवार और शनिवार को विशेष भीड़ होती है।
  • बागेश्वर धाम का मंदिर हरे-भरे प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित है। यहां भगवान हनुमान की भव्य मूर्ति स्थापित है।
  • हनुमान जयंती और रामनवमी पर यहां बड़े धार्मिक आयोजन होते हैं।

10. यंत्रोधरका हनुमान मंदिर, हम्पी-कर्नाटक

हनुमान जी को समर्पित एक हिंदू मंदिर है जिसे प्राणदेव या रामभक्त हनुमान मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर की वास्तुकला में विजयनगर शैली का उत्कृष्ट नमूना देखने को मिलता है। इसमें जटिल नक्काशीदार खंभे और शांत वातावरण है। मंदिर से आसपास के परिदृश्य का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है।

मुख्य आकर्षण:

  • मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी का जन्मस्थान यहीं हुआ था।
  • मंदिर के चहुँ ओर फैले पत्थरों के बारे मैं प्रचलित है कि ये सब माता अंजनी के दुग्ध की एक बूँद के पहाड़ी पर पड़ने से वो पूरी पहाड़ी टूटकर बिखर गयी।
  • यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल हम्पी के खंडहरों के बीच बसा है यंत्रोधरका हनुमान मंदिर।
  • मान्यता है की भगवान राम और हनुमान जी की मुलाकात भी पहली बार यहीं हुयी थी।

11. नमक्कल आंजनेयार मंदिर, नमक्कल-तमिलनाडु

तमिलनाडु के नमक्कल जिले में पहाड़ियों के बीच मौजूद आंजनेयार मंदिर दुनिया के सबसे प्राचीन हनुमान मंदिरों में से एक है। करीब 5 शताब्दी के दौरान बनाए गए इस मंदिर में भगवान हनुमान की 18 फीट ऊंची प्रतिमा हाथ जोड़े खड़ी है। खास बात ये है कि इस मंदिर में भगवान हनुमान श्रीराम नहीं बल्कि विष्णु के ही अवतार भगवान नृसिंह की सेवा में खड़े हैं।  इस मंदिर को लेकर कई सारी कथाएं हैं। इसे भगवान विष्णु, लक्ष्मी और हनुमान से जोड़ा जाता है। मंदिर के सामने एक पहाड़ी है, इसे नृसिंह हिल कहा जाता है। मान्यता है कि इस पहाड़ी में देवी लक्ष्मी को भगवान विष्णु ने नृसिंह रूप में दर्शन दिए थे।

मुख्य आकर्षण:

  • मंदिर में हनुमान की 18 फ़ीट ऊंची मूर्ति है।
  • माता लक्ष्मी यहीं पर विष्णु भगवान की तपस्या मैं लीं थी ताकि उनको भगवान के नरसिंह अवतार के दर्शन हो सकें।
  • मंदिर में चार दैनिक अनुष्ठान और कई वार्षिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं।
  • अंजनेयर की छवि एक ही पत्थर को तराश कर बनाई गई है और माना जाता है कि यह 5वीं शताब्दी से मौजूद है।

भारत मैं स्थित हनुमान मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं हैं, बल्कि ये हमारी संस्कृति, वास्तुकला और आस्था का प्रतीक भी हैं। इन मंदिरों की यात्रा भक्तों को न केवल आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है, बल्कि उन्हें अपने भीतर की शांति और भक्ति का अनुभव भी कराती है।

हनुमान जी के जीवन और कार्यों से हमें प्रेरणा मिलती है कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ भक्ति, निष्ठा, और साहस है। वे अपने भक्तों के लिए एक आदर्श देवता हैं, जो हमें यह सिखाते हैं कि अपने कर्तव्यों को निभाते हुए, जीवन में सच्चे प्रेम और समर्पण के साथ भगवान की सेवा करनी चाहिए। हनुमान जी का आशीर्वाद हमारे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाए।

“जय श्री राम, जय हनुमान!”

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शिव चालीसा: भगवान शिव का आशीर्वाद पाने का सरल उपाय, अर्थ सहित हिंदी मैं

शिव चालीसा एक भक्ति स्तोत्र है जो भगवान शिव की स्तुति और महिमा का वर्णन करता है। इसमें 40 चौपाइयां और दोहों के माध्यम से शिव के अद्वितीय रूप, शक्ति और आशीर्वाद का गुणगान किया गया है। शिव चालीसा का पाठ करने से मन को शांति मिलती है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। भक्त इसे नियमित रूप से पढ़कर अपने जीवन में शिव की उपस्थिति का अनुभव करते हैं और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

अर्थ- हे पार्वती सुत, सभी मंगल कार्यों के ज्ञाता श्री गणेश जी, आपकी जय हो। मैं अयोध्यादास आपसे वरदान मांगता हूँ।

॥ चौपाई ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला, सदा करत सन्तन प्रतिपाला ।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके, कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अर्थ- हे पार्वती वल्लभ, आपकी जय हो! आप दीन लोगों पर कृपा और साधु-संतजनों की रक्षा करने वाले हो। हे त्रिशूलधारी, नीलकण्ठ! आपके मस्तक पर चन्द्रमा सुशोभित है और कानो में नागफनी के कुण्डल शोभायमान हैं।

अंग गौर शिर गंग बहाये, मुण्डमाल तन क्षार लगाए ।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे, छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

अर्थ- आप गौर वर्णी हैं जिनके सर की जटाओं में गंगाजी बह रही हैं, गले में मूण्डों की माला है और शरीर पर भस्म लगा रखी है। हे त्रिलोकी, आपके वस्त्र बाघ की खाल के हैं। आपकी शोभा को देखकर नाग और मुनिजन मोहित हो रहे हैं।

मैना मातु की हवे दुलारी, बाम अंग सोहत छवि न्यारी ।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी, करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

अर्थ- माता मैना की प्रिय पुत्री पार्वतीजी आपके बाईं ओर सुशोभित हैं इनकी आभा एवं शोभा अत्यंत निराली और न्यारी है। आपके हाथ में धारण किया हुआ त्रिशूल अपनी उत्तम छवि से शोभामान हो रहा है जिससे आप सदैव शत्रुओं का संहार करते रहते हैं।

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे, सागर मध्य कमल हैं जैसे ।
कार्तिक श्याम और गणराऊ, या छवि को कहि जात न काऊ ॥

अर्थ- आपके पास आपका वाहन नन्दी और गणेशजी कुछ इस प्रकार शोभायमान हो रहे हैं जैसे समुद्र के बीच में कमल खिले हों। कार्तिकेयजी और उनके गण वहां पर विराजमान हैं। इस दृश्य की शोभा का वर्णन करना असंभव है।

देवन जबहीं जाय पुकारा, तब ही दुख प्रभु आप निवारा ।
किया उपद्रव तारक भारी, देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

अर्थ- हे प्रभु, देवताओं ने जब भी आपसे सहायता की पुकार की, आपने बिना विलम्ब किए उनके सभी कष्ट दूर किए हैं। जब ताड़कासुर ने भीषण अत्याचार करने आरंभ किए तो सभी देवताओं ने आपसे रक्षा करने की प्रार्थना की।

तुरत षडानन आप पठायउ, लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ।
आप जलंधर असुर संहारा, सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

अर्थ- आपने उसी समय कार्तिकेयजी को वहां भेजा जिन्होंने उस राक्षस को मार गिराया। आपने जलंधर नामक भयंकर राक्षस का संहार किया। आपकी ऐसी कीर्ति से समस्त संसार परिचित है।

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई, सबहिं कृपा कर लीन बचाई ।
किया तपहिं भागीरथ भारी, पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

अर्थ- त्रिपुर नामक दुर्दांत राक्षस से युद्ध करके आपने सभी देवताओं पर कृपा करके उनको उस दुष्ट के आतंक से मुक्त किया। राजा भगीरथ के कठोर तप से प्रसन्न होने के बाद आपने अपनी जटाओं में वास करती मोक्षदायिनी गंगा को जाने की आज्ञा दी। आपके आश्रीवाद से ही राजा भगीरथ की प्रतिज्ञा पूरी हो सकी।

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं, सेवक स्तुति करत सदाहीं ।
वेद नाम महिमा तव गाई, अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥

अर्थ- आपकी बराबरी करने वाला कोई दानी तीनो लोकों मैं नहीं है। भक्त लोग सदैव ही आपका गुणगान व यशोगान करते हैं। वेदों में भी आपकी महिमा का वर्णन है। परंतु अनादि होने के कारण आपका रहस्य कोई भी नहीं पा सका।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला, जरत सुरासुर भए विहाला ।
कीन्ही दया तहं करी सहाई, नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

अर्थ- समुद्र मंथन से जो ज्वाला रुपी हलाहल निकला उसके ताप से देवता और राक्षस दोनों जलने लगे और और त्राहिमाम करने लगे। तब आपने उस ज्वाला रुपी हलाहल को अपने कंठ मैं स्थान देकर सभी की रक्षा की। हे महादेव, तभी से आपका नाम नीलकंठ पड़ गया।

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा , जीत के लंक विभीषण दीन्हा ।
सहस कमल में हो रहे धारी, कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥

अर्थ- लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व श्रीराम ने आपकी वंदना के बाद ही विजयश्री प्राप्त की और विभीषण को लंका का अधिपति बना दिया। जब श्री रामचन्द्रजी सहस्त्र कमलों से आपकी पूजा कर रहे थे तब आपने फूलों में रहकर उनकी परीक्षा ली।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई, कमल नयन पूजन चहं सोई ।
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर, भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

अर्थ- आपने अपनी माया से एक कमल का फूल छिपा दिया। तब रामचन्द्रजी ने नयनरूपी कमल से पूजा करने की बात सोची। हे भोलेनाथ, इस प्रकार जब आपने रामचन्द्रजी की यह दृढ़ आस्था देखी तब आपने प्रसन्न होकर उन्हें मनचाहा वरदान दिया।

जय जय जय अनन्त अविनाशी, करत कृपा सब के घटवासी ।
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै, भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥

अर्थ- हे देवाधिदेव महादेव आप अनन्त हैं, अनश्वर हैं। आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप सबके हृदय में रहकर उन पर कृपा करते हैं। दुष्ट विचार सदैव मुझे पीड़ित करते हैं और सताते रहते हैं जिससे मैं भ्रमित रहता हूं और मुझे कहीं चैन नहीं मिलता है।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो, येहि अवसर मोहि आन उबारो ।
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो, संकट से मोहि आन उबारो ॥

अर्थ- हे नाथ, कृपया मेरी रक्षा कीजिये, ऐसा अनुनय करते हुए मैं आपको पुकार रहा हूं। अब आप ही मुझे संकटों व कष्टो से उबारें। अपने त्रिशूल से मेरे सभी प्रकार के शत्रुओं का नाश कीजिये और संकट से मेरा उद्धार कर मुझे भवसागर से पार लगाने की कृपा करो कृपानिधान।

मात-पिता भ्राता सब होई, संकट में पूछत नहिं कोई ।
स्वामी एक है आस तुम्हारी, आय हरहु मम संकट भारी ॥

अर्थ- माता, पिता, भाई-बंधु सबके पास होते हैं पर कष्ट और दुखों में कोई साथ नहीं दे पाता। हे स्वामी, बस आप ही हैं जो मेरे कष्टों और संकटों की हर सकते हैं, बस आप ही हैं जो मेरे अंधियारे जीवन मैं प्रकाश कर सकते हैं।

धन निर्धन को देत सदा हीं, जो कोई जांचे सो फल पाहीं ।
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी, क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

अर्थ- आप सदैव ही निर्धनों की सहायता करते हैं। आपसे जिस फल की कामना की जाती है वही फल प्राप्त होता है। आपकी पूजा-अर्चना कैसे की जाती है मुझे इस्जा ज्ञान नहीं। अतः मुझसे जो भी भूल-चूक हो उसे क्षमा कर देना।

शंकर हो संकट के नाशन, मंगल कारण विघ्न विनाशन ।
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं, शारद नारद शीश नवावैं ॥

अर्थ- हे त्रिनेत्रधारी, आप ही कष्टों को नष्ट करने वाले हैं। सभी शुभ कार्यो को कराने वाले हैं तथा सब विध्न-बाधाओं को दूर करके कल्याण करने वाले हैं। योगी, यति और मुनि सभी आपका स्मरण करते हैं। देवमुनि नारद और देवी सरस्वती (शारदा) भी आपको नमन करते हैं।

नमो नमो जय नमः शिवाय, सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ।
जो यह पाठ करे मन लाई, ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

अर्थ- ‘ॐ नमः शिवाय’ इस पञ्चाक्षर मंत्र का जाप करके भी ब्रह्मा आदि देवता आपकी महिमा का पार नहीं प सके। जो कोई भी सच्चे मन तथा निष्ठा से शिव चालीसा का पाठ करता है, भगवन शिव शम्भू उसकी सहायता कर उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण करते हैं।

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी, पाठ करे सो पावन हारी ।
पुत्र हीन कर इच्छा जोई, निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥

अर्थ- हे कृपानिधान, कर्ज मैं दबा हुआ व्यक्ति भी आपके नामजप से ऋण-मुक्त हो सुख-समृद्धि प्राप्त करता है। पुत्र प्राप्ति की कामना से से आपका पाठ करने वाले व्यक्ति को भी आपकी कृपा से सहज ही पुत्र-रत्न की प्राप्ति होती है।

पण्डित त्रयोदशी को लावे, ध्यान पूर्वक होम करावे ।
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा, ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

अर्थ- आपके हर भक्त और श्रद्धालु तथा को प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को विद्वान पण्डित को बुलाकर पूजा तथा हवन करवाना चाहिए। जो भी भक्त सदैव त्रयोदशी का व्रत करता है, उसके शरीर में कोई रोग नहीं रहता और किसी प्रकार का क्लेश भी मन में नहीं रहता।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे, शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ।
जन्म जन्म के पाप नसावे, अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी । जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

अर्थ- धूप-दीप और नैवेध से पूजन करके शिवजी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख बैठकर शिव चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करना चाहिए। इससे जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त में मनुष्य शिवलोक में वास करने लगता है अथार्त मुक्त हो जाता है। अयोध्यादासजी कहते हैं कि बस आपसे ही हमारी आशा है कि आप हमारी मनोकामनाएं पूरी करके हमारे दुखों को दूर करें हे महादेव।

॥ दोहा ॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीस ।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥

अर्थ- इस शिव चालीसा का चालीस बार प्रतिदिन पाठ करने से भगवान मनोकामना पूर्ण करते हैं। मृगशिर मास कि छ्ठी तिथि हेमंत ऋतु संवत 64 में यह चालीसा रूपी शिव स्तुति लोक कल्याण के लिए पूर्ण हुई।

शिव चालीसा के प्रमुख लाभ:

  1. मन को शांति: नियमित पाठ से मानसिक तनाव दूर होता है।
  2. सकारात्मकता का संचार: नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके सकारात्मकता लाता है।
  3. स्वास्थ्य में सुधार: शिव की कृपा से रोगों से मुक्ति मिलती है।

शिव चालीसा का पाठ करना भक्तों में आत्मविश्वास और साहस को बढ़ाता है। शिव भक्तों को इसे प्रतिदिन या विशेष रूप से सोमवार के दिन पढ़ना चाहिए।


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शिव पंचाक्षर स्तोत्र मंत्र अर्थ सहित हिंदी मैं

शिव पंचाक्षर स्तोत्र एक प्रसिद्ध मंत्र है जो भगवान शिव की आराधना में गाया जाता है। इसमें भगवान शिव के पांच पवित्र अक्षरों (“न, म, शि, वा, य”) की महिमा का वर्णन है। इसे रचयिता आदिगुरु शंकराचार्य ने लिखा था। इस स्तोत्र में भगवान शिव के दिव्य स्वरूप और उनकी अनंत शक्तियों की प्रशंसा की गई है। यह स्तोत्र भगवान शिव के भक्तों के लिए शक्ति, शांति, और आशीर्वाद प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है।

प्रत्येक अक्षर के माध्यम से भगवान शिव की भव्यता का चित्रण किया गया है, साथ ही हर अक्षर पंच तत्वों मैं से हर एक तत्त्व का प्रतिनिधित्व भी करता है:

  • “न”: नागेंद्रहाराय (सर्प का हार), पृथ्वी तत्त्व का प्रतिनिधित्व
  • “म”: त्रिलोचनाय (तीन नेत्र वाले), जल तत्त्व का प्रतिनिधित्व
  • “शि”: भस्मअंगरागाय (भस्म लेपन करने वाले), अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व
  • “वा”: दिगंबराय (आकाश रुपी वस्त्रधारी), वायु तत्त्व का प्रतिनिधित्व और
  • “य”: महेश्वराय (महान भगवान), आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है।

अर्थ: जिनके कण्ठ में सर्पों का हार है, जिनके तीन नेत्र हैं, भस्म ही जिनका अंगराग है और दिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं अर्थात् जो दिगम्बर (निर्वस्त्र) हैं ऐसे शुद्ध अविनाशी महेश्वर  कारस्वरूप शिव को नमस्कार है॥

अर्थ: गङ्गाजल और चन्दन से जिनकी अर्चना हुई है, मन्दार-पुष्प तथा अन्य पुष्पों से जिनकी भलिभाँति पूजा हुई है। नन्दी के अधिपति, शिवगणों के स्वामी महेश्वर  कारस्वरूप शिव को नमस्कार है॥

अर्थ: जो कल्याणस्वरूप हैं, पार्वतीजी के मुखकमल को प्रसन्न करने के लिए जो सूर्यस्वरूप हैं, जो दक्ष के यज्ञ का नाश करनेवाले हैं, जिनकी ध्वजा में वृषभ (बैल) का चिह्न शोभायमान है, ऐसे नीलकण्ठ शि कारस्वरूप शिव को नमस्कार है॥

अर्थ: वसिष्ठ मुनि, अगस्त्य ऋषि और गौतम ऋषि तथा इन्द्र आदि देवताओं ने जिनके मस्तक की पूजा की है, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके नेत्र हैं, ऐसे  कारस्वरूप शिव को नमस्कार है॥

अर्थ: जिन्होंने यक्ष स्वरूप धारण किया है, जो जटाधारी हैं, जिनके हाथ में पिनाक धनुष है, जो दिव्य सनातन पुरुष हैं, ऐसे दिगम्बर देव  कारस्वरूप शिव को नमस्कार है।

अर्थ: जो शिव के समीप इस पवित्र पञ्चाक्षर स्तोत्र का पाठ करता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है और वहाँ शिवजी के साथ आनन्दित होता है।

यह स्तोत्र भक्तों के जीवन में साहस, आशीर्वाद, और सफलता का संचार करता है। यह स्तोत्र भगवान शिव के प्रति भक्ति और श्रद्धा को प्रकट करने के लिए अद्वितीय माना जाता है। इसका नियमित पाठ करने से मन शांत होता है और शिव की कृपा प्राप्त होती है।


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हनुमान बाहुक: भक्तों की सभी पीड़ाओं का अंत करने वाला स्तोत्र

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान की महिमा का गान करने वाला एक अत्यंत प्रभावशाली और प्राचीन स्तोत्र है। यह स्तोत्र खासतौर पर उन भक्तों के लिए प्रसिद्ध है जो शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कष्टों से पीड़ित हैं। हनुमान बाहुक का पाठ करने से व्यक्ति की सभी प्रकार की पीड़ाओं का नाश होता है, और उसे आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। इस स्तोत्र की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी, जिन्हें भगवान हनुमान के परम भक्त के रूप में जाना जाता है।

हनुमान बाहुक की रचना और महत्ता

हनुमान बाहुक की रचना तब की गई जब तुलसीदास जी एक गहरे शारीरिक कष्ट से गुजर रहे थे। उनकी बाहों में अत्यधिक दर्द था और उन्होंने इस कष्ट से छुटकारा पाने के लिए भगवान हनुमान का ध्यान करते हुए इस स्तोत्र की रचना की। हनुमान जी की कृपा से उन्हें न केवल शारीरिक कष्टों से छुटकारा मिला, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक शांति भी प्राप्त हुई।

सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ।।
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट ।।1।।

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज्र बज्र-तन ।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल बल भानन ।।
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट ।।2।।

पञ्चमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल, बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
दुवन-दल-दमन को कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो ।।3।।

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।।4।।

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ।।
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूँ तें घाटि नभतल भो ।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जो हैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ।।5।।

गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।।
संकट समाज असमंजस भो रामराज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ।।6।।

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ।।
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईंधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ।।7।।

दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको, तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ।।
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ।।8।।

दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ।।
लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ।।9।।

महाबल-सीम महाभीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीर को ।।
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ।।10।।

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि, हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ।।
खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ।।11।।

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ।।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ-तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ।।12।।

सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ।।
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ।।13।।

करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही, नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ।।14।।

मन को अगम, तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ।।15।।

जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ।।
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहाँ तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तें आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तौ हिय हारो ।।16।।

तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले ।।
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ।।17।।

सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से ।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से ।।
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ।।18।।

अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुञ्जर केहरि-बारो ।।
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूँ-तें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो ।।19।।

जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन, मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ।।
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ।।20।।

बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ।।
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये ।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर, बाँहुपीर राहुमातु ज्यौं पछारि मारिये ।।21।।

उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो सँभारिये ।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।।
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यौं पकरि कै बदन बिदारिये ।।22।।

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।।
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै बिचारिये ।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह-पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ।।23।।

लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ।।
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ।।24।।

करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बकभगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहूबल बालक छबीले छोटे छरैगी ।।
आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसी की, बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ।।25।।

भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ।।
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ।।26।।

सिंहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ।।
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महँतारी है ।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ।।27।।

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहु की ।।
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ।।28।।

टूकनि को घर-घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ।।
इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु, कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ।।29।।

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ।।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ।।30।।

दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ।।
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ।।31।।

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ।।
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ।।32।।

तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ।।
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ।।33।।

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ।।
अँबु तू हौं अँबुचर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ।।34।।

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ।।
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजैं ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।।35।।

राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।।
बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ।।36।।

काल की करालता करम कठिनाई कीधौं, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ।।
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ।।37।।

पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुँह पीर, जरजर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ।।38।।

बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुँहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ।।
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ, जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।
तुलसी सँभारि ताड़का सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ।।39।।

बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।।
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।।40।।

असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ।।
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ।।41।।

जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।
तुलसी के दुहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँउ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ।।
मोको झूटो साँचो लोग राम को कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ।।42।।

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।।
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ।।43।।

कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।।
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि, हौं हूँ रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ।।44।।

।।श्री राम जय राम जय जय राम।।


हनुमान बाहुक का पाठ करने के लाभ

हनुमान बाहुक का पाठ करने से कई प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:

  1. शारीरिक कष्टों से मुक्ति: यदि व्यक्ति किसी शारीरिक कष्ट से पीड़ित है, तो हनुमान बाहुक का पाठ उसके लिए अत्यंत लाभकारी हो सकता है।
  2. मानसिक शांति: यह स्तोत्र मानसिक परेशानियों, चिंता, तनाव और अवसाद को दूर करने में सहायक होता है।
  3. आध्यात्मिक उन्नति: हनुमान बाहुक का पाठ व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है, जिससे वह जीवन के बड़े लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।
  4. संकटों से रक्षा: हनुमान जी को संकटमोचक कहा जाता है, और इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है।
  5. धन और समृद्धि: हनुमान जी की कृपा से व्यक्ति के जीवन में धन, सुख और समृद्धि आती है।

हनुमान बाहुक का पाठ करने की विधि

हनुमान बाहुक का पाठ करने के लिए किसी विशेष तैयारी की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन यदि व्यक्ति इसे विधिपूर्वक करना चाहता है, तो कुछ बातों का ध्यान रखा जा सकता है:

  1. स्वच्छता: पाठ करते समय शरीर और मन को स्वच्छ रखना आवश्यक है। स्नान करके, स्वच्छ वस्त्र धारण करके पाठ करें।
  2. हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने: हनुमान जी की मूर्ति या तस्वीर के सामने बैठकर पाठ करना अधिक फलदायक माना जाता है।
  3. संकल्प और श्रद्धा: पाठ करते समय हनुमान जी के प्रति श्रद्धा और विश्वास बनाए रखना आवश्यक है। ध्यान रखें कि आपकी श्रद्धा ही आपकी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करेगी।
  4. अक्षत और सिंदूर: हनुमान जी को अक्षत (चावल) और सिंदूर चढ़ाने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है।

हनुमान बाहुक के पाठ के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें

  • इस स्तोत्र का पाठ लगातार 11, 21, या 108 बार किया जा सकता है।
  • यदि संभव हो, तो इसे सुबह के समय या सूर्यास्त के बाद शांत वातावरण में बैठकर करें।
  • मन की एकाग्रता और भगवान हनुमान पर अटूट विश्वास इस पाठ को प्रभावी बनाते हैं।

हनुमान बाहुक भगवान हनुमान की शक्ति और कृपा का प्रतीक है। यह स्तोत्र शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्टों से मुक्ति दिलाने में अद्वितीय है। जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ इसका पाठ करता है, उसकी सभी परेशानियाँ हनुमान जी की कृपा से समाप्त हो जाती हैं। यदि आप भी अपने जीवन में किसी प्रकार की परेशानी का सामना कर रहे हैं, तो हनुमान बाहुक का पाठ करें और भगवान हनुमान की कृपा प्राप्त करें।


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श्रीराम स्तुति अर्थ सहित हिंदी मैं

श्रीराम स्तुति एक प्रार्थना है जो भगवान श्रीराम की स्तुति और महिमा का गुणगान करती है। इसे पढ़ने से व्यक्ति के जीवन में भगवान राम के आशीर्वाद प्राप्त होते हैं। यहां श्रीराम स्तुति का हिंदी अर्थ सहित वर्णन किया गया है:

श्रीराम स्तुति:

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम्।
नवकंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणम्॥

अर्थ: प्रभु श्रीरामचन्द्र जो कृपालु हैं, इस संसार के भय और कष्ट को हरने वाले हैं। जिनकी आँखें नव विकसित कमल के समान हैं, मुख कमल के समान है, उनके कर (हाथ) कमल के समान हैं, और उनके चरण भी लालिमा लिए हुए कमल के समान हैं। ऐसे कृपानिधान को मैं शुद्ध मन से नमन व स्मरण करता हूँ।

कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुंदरम्।
पट पीत मानहु तडित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरम्॥

अर्थ: प्रभु श्रीराम की सुंदरता अनगिनत कामदेवों से भी अधिक है। उनका रूप नव नीलकमल जैसा है, जो घने नीले बादलों की तरह सुंदर है। वे पीताम्बर अर्थात पीले वस्त्र धारण करते हैं, जो बिजली की चमक के समान उज्ज्वल है। मैं ऐसे प्रभु श्रीराम को नमन करता हूँ, जो जनक की पुत्री (सीता) के पति हैं।

भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।
रघुनन्द आनन्दकन्द कोशलचन्द्र दशरथ नन्दनम्॥

अर्थ: जो दीनों और दुखियों के मित्र हैं, सूर्य के समान तेजस्वी व संसार के पालनहार हैं और दानवों व दैत्यों के वंश का नाश करने वाले हैं। वे रघुकुल के आनंद के स्रोत हैं, कौशल राज्य के चंद्रमा हैं और राजा दशरथ के पुत्र हैं।

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणम्।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणम्॥

अर्थ: जिनके सिर पर सुंदर मुकुट विराजमान है, कानों में कुंडल और उनके मस्तक पर सुंदर तिलक है। उनके अंगों पर दिव्य आभूषण सुशोभित हैं। वे लम्बी भुजाओं वाले हैं, उनके हाथों में धनुष और बाण है और जिन्होंने संग्राम में खर-दूषण जैसे राक्षसों को पराजित किया है।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।
मम ह्रदय कंज निवास कुरु कामादि खल दल गंजनम्॥

अर्थ: तुलसीदास जी कहते हैं कि भगवान श्रीराम देवाधिदेव महादेव शंकर, शेषनाग और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। हे श्रीराम! मेरे हृदय रूपी कमल में निवास करो और काम, क्रोध आदि दुष्ट विचारों का नाश करो।

श्रीराम स्तुति का महत्व:

श्रीराम स्तुति भगवान राम की महिमा का गुणगान करने वाली एक अत्यंत सुंदर प्रार्थना है। यह स्तुति व्यक्ति के भीतर भक्ति और श्रद्धा को जाग्रत करती है और उन्हें जीवन के कष्टों से मुक्ति दिलाने में सहायक होती है। इस स्तुति को नियमित रूप से करने से मनुष्य के मन में शांति, भक्ति और भगवान राम के प्रति असीम प्रेम की भावना विकसित होती है।


डिस्क्लेमर: इस लेख मैं दी गयी जानकारी की सटीकता की हम गारंटी नहीं देते, ये लेख विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों अथवा पुस्तकों से संगृहीत कर के आप तक पहुँचाया गया है, हमारा उद्देश्य आप तक सूचना पहुँचाना मात्र है, इसलिए किसी भी त्रुटि सुधार के लिए सम्बंधित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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श्री हनुमान चालीसा (अर्थ सहित) हिंदी मैं

हनुमान चालीसा का लेखन गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया था। तुलसीदास जी, जिन्हें भारतीय भक्ति साहित्य के महान कवि और संत के रूप में जाना जाता है, का उद्देश्य हनुमान जी की शक्ति, भक्ति, और समर्पण की महिमा का गुणगान करना है। तुलसीदास जी ने इस चालीसा की रचना मुख्य रूप से यह बताने के लिए की थी कि हनुमान जी के स्मरण और भक्ति से भक्तों के सभी प्रकार के कष्ट, भय और बाधाएं दूर हो सकती हैं। इसमें हनुमान जी के जीवन के प्रमुख घटनाओं का वर्णन भी मिलता है, जैसे कि श्री राम की सेवा में उनका योगदान, उनकी वीरता, और उनकी अद्वितीय भक्ति।

इसके अलावा, हनुमान चालीसा के माध्यम से तुलसीदास जी ने साधारण जनों को भी हनुमान जी के प्रति भक्ति और आस्था की ओर प्रेरित किया, क्योंकि यह सरल और समझने में आसान है, और इसे नियमित रूप से पढ़ने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार ।
बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार ॥

अर्थ: गुरु महाराज के चरणों की धूल से पवित्र मन को पवित्र कर प्रभु श्रीराम के पवित्र और निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाले हैं। हे पवनपुत्र हनुमान जी मैं आपका स्मरण करता हूँ, आप मेरी बुद्धिहीनता और दुर्बलता को स्वीकार करते हुए, मेरे सभी क्लेशों और विकारों का नाश करें और मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करें।

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥

अर्थ: हे हनुमान जी आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं, हे कपीस राज आप तीनों लोकों मैं प्रसिद्द हैं, आप की जय हो।

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥

अर्थ: अतुलित बल धारण करने वाले हे अंजनी पुत्र, हे पवन सुत आप प्रभु के राम के दूत हैं।

महाबीर बिक्रम बजरंगी ।
कुमति निवार सुमति के संगी ॥

अर्थ: आप महा पराक्रमी और बलशाली हैं, आप कुमति को दंड देते हैं और सुमति की सदैव सहायता करते हैं।

कंचन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुंडल कुँचित केसा ॥

अर्थ: आपकी काया स्वर्ण जैसी है, जिसपर आप सुन्दर वस्त्र, कानो मैं कुण्डल हैं और सुन्दर केशों को धारण करते हैं।

हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे ।
काँधे मूँज जनेऊ साजे ॥

अर्थ: आपके एक हाथ मैं वज्रा और दूजे मैं ध्वज विराजमान हैं और आप जनेऊ से सुशोभित हैं।

शंकर सुवन केसरी नंदन ।
तेज प्रताप महा जगवंदन ॥

अर्थ: हे केसरी नंदन, आप स्वयं महादेव शंकर का अवतार हैं और अपने पराक्रम और यश का समस्त विश्व वंदन करता है।

विद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥

अर्थ: आप अति विद्वान एवं चतुर हैं और प्रभु श्री राम के काम करने के लिए सदैव ही आतुर रहते हैं।

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मनबसिया ॥

अर्थ: आप को प्रभु श्री राम की स्तुति सुनना अधिक आनंद प्रिय है, प्रभु राम, माता सीता और लक्ष्मण जी सदैव ही आपके हृदय मैं वास करते हैं।

सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा ।
विकट रूप धरि लंक जरावा ॥

अर्थ: आप सूक्ष्म रूप मैं सीता माता के सामने प्रकट हुए और विशाल रूप धारण करके लंका दहन किया।

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचंद्र के काज सवाँरे ॥

अर्थ: आपने भीष्म रूप धारण असुरों का संहार किया और प्रभु श्री राम के द्वारा दिया कार्य पूर्ण किया।

लाय सजीवन लखन जियाए ।
श्री रघुबीर हरषि उर लाए ॥

अर्थ: आप सुदूर स्थित संजीवनी बूटी लेकर आये और लक्ष्मण जी के प्राणो की रक्षा की और प्रभु श्री राम को हर्ष की अनुभूति करवाई।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई ॥

अर्थ: प्रभु श्री राम ने आपकी प्रशंसा करते हुए कहा कि आप उनके छोटे भाई भरत के सामान ही हो।

सहस बदन तुम्हरो जस गावै ।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै ॥

अर्थ: हजारों लोग तुम्हारा यशगान करें ऐसा कहकर प्रभु श्री राम ने आपको अपने हृदय से लगा लिया।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥

अर्थ: समस्त ऋषि, महर्षि, देवगण, नारद जी, ब्रह्मा जी आदि आपका यशगान करते हैं।

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते ॥

अर्थ: आपका यश ऐसा है कि यमराज, कुबेर, दसों दिशाओं की रक्षा करने वाले, कवि, विद्वान अथवा पंडित मिलकर भी आपके यश और कीर्ति का पूर्ण गुणगान नहीं कर सकते।

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा ।
राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥

अर्थ: अपने कपि राज सुग्रीव को प्रभु श्री राम से मिलवाकर उनपर बहुत उपकार किया जिससे वो अपने खोये राज्य को वापस पा सके।

तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना ।
लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥

अर्थ: आपकी की ही बात मानकर विभीषण ने प्रभु श्री राम के कार्य मैं उनकी सहायता की, जिसके फलस्वरुप दुष्टों के संहार के बाद वो लंकापति बन पाए ये तो समस्त जग जानता है।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू ।
लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू ॥

अर्थ: आप सूर्य को एक मीठा फल जानकर उसको खाने की मंशा से उस तक पहुँच गए जो एक जुग, एक सहत्र तथा एक योजन दूर स्थित है।

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही ।
जलधि लाँघि गए अचरज नाही ॥

अर्थ: आप इतने बलशाली हैं की प्रभु श्री राम की अंगूठी को लेकर माता सीता की खोज मैं विशाल सागर को भी लाँघ गए इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥

अर्थ: संसार के दुष्कर से दुष्कर कार्य भी आपके स्मरण मात्र से ही आसानी से पूर्ण हो जाते हैं।

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत ना आज्ञा बिनु पैसारे ॥

अर्थ: आप प्रभु श्री राम के द्वार के रक्षक हो और उनकी कृपा पाने के लिए, आपकी परीक्षा मैं उत्तीर्ण होने पर ही ये सौभग्य मिलता है।

सब सुख लहैं तुम्हारी सरना ।
तुम रक्षक काहु को डरना ॥

अर्थ: आपकी शरण मैं आने मात्र से ही कोई भी आनंद की प्राप्ति कर सकता है और जिसकी रक्षा स्वयं आप करते हो उसके सभी भय समाप्त हो जाते हैं।

आपन तेज सम्हारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तै कापै ॥

अर्थ: आपका तेज और वेग आपके सिवाय कोई भी नहीं संभाल सकता और आपकी एक हांक से ही तीनों लोक मैं कम्पन हो जाता है।

भूत पिशाच निकट नहि आवै ।
महावीर जब नाम सुनावै ॥

अर्थ: आपके नाम के सुमिरन मात्र से ही कोई भी आसुरी शक्ति, भूत और प्रेत बाधा किसी को परेशान करने का साहस भी नहीं कर सकती।

नासै रोग हरे सब पीरा ।
जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥

अर्थ: आपके नाम के निरंतर जाप करने से रोग का नाश और पीड़ा का निवारण हो जाता है।

संकट तै हनुमान छुडावै ।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥

अर्थ: अपने मन मैं, कार्य मैं और वचन मैं जो भी आपका सुमिरन करता है उसके सभी संकटों को आप दूर कर देते हो।

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिनके काज सकल तुम साजा ॥

अर्थ: प्रभु श्री राम तपस्वी एवं श्रेष्ठ राजा हैं और आपकी उनके स्नेह को आतुर हो उनके सभी कार्यों को सहजता से पूर्ण करते हो।

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥

अर्थ: जो कोई भी श्रद्धा भाव से अपने मनोरथ करता है वो आपकी कृपा का पात्र बन जीवन मैं आपके आशीर्वाद स्वरूपी फल को प्राप्त करता है।

चारों जुग परताप तुम्हारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥

अर्थ: आपका यश और कीर्ति चरों युगों मैं फैली है और सम्पूर्ण जगत मैं आपके नाम का प्रकाश फैला हुआ है।

साधु संत के तुम रखवारे ।
असुर निकंदन राम दुलारे ॥

अर्थ: आप प्रभु श्री राम के दुलारे हैं, साधु और संतो की रक्षा करते हैं और दुष्टो और असुरों का नाश करते।

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥

अर्थ: माता जानकी के वरदान स्वरुप, आप ही आठ सिद्धियों और नौ निधियों के दाता हैं और आपकी कृपा से ही इन सिद्धियों और निधियों को प्राप्त किया जा सकता है।

राम रसायन तुम्हरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥

अर्थ: आप सदैव ही प्रभु श्री राम के सान्निध्य मैं रहते हैं और इसलिए आपके पास ही राम रुपी औषधि है जो कष्ट और पीड़ा को हरने वाली है।

तुम्हरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥

अर्थ: आपके नाम का सुमिरन करने से प्रभु श्री राम के प्राप्त करने का रास्ता सुगम हो जाता है और जन्म जन्मांतर के दुखों से मुक्ति मिलती है।

अंतकाल रघुवरपुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥

अर्थ: आपको सुमिरन करने से जीवन को पूर्ण करने के बाद श्री रघुनाथ के धाम मैं आश्रय मिलता है और पुनर्जम के बाद भी हरि भक्ति का सौभाग्य प्राप्त होता है।

और देवता चित्त ना धरई ।
हनुमत सेई सर्व सुख करई ॥

अर्थ: आपकी भक्ति करने पर जो फल मिलता है वो किसी देवता को चित्त मैं धारण करने से कहीं ज्यादा गुणकारी है।

संकट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥

अर्थ: आपको सुमिरन करने मात्र से ही समस्त संकटों एवं पीड़ा का नाश हो जाता है।

जै जै जै हनुमान गुसाईँ ।
कृपा करहु गुरु देव की नाई ॥

अर्थ: हे हनुमान जी आपकी तीनों लोकों मैं जय हो और आपका आशीर्वाद मुझे गुरु के रूप मैं प्राप्त हो।

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बंदि महा सुख होई ॥

अर्थ: जो भी हनुमान चालीसा का नित्य सौ बार पाठ करेगा उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे और उसको आनंद की प्राप्ति होगी।

जो यह पढ़े हनुमान चालीसा ।
होय सिद्ध साखी गौरीसा ॥

अर्थ: इस हनुमान चालीसा को पढ़ने मात्र से ही आपको अपने कार्यों मैं आशानुरूप परिणाम प्राप्त होने लगते हैं।

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥

अर्थ: तुलसीदास बताते हैं की वो प्रभु श्री राम के अनन्य भक्त हैं और हनुमान जी से निवेदन कर रहे हैं कि वो उनके हृदय मैं निवास करें।

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप ॥

अर्थ: इसी प्रकार हे संकट हरने वाले, सबका मंगल करने वाले पवन कुमार मैं आपसे अनुनय करता हूँ कि आप प्रभु श्री राम, माता सीता एवं लक्ष्मण जी के साथ मेरे ह्रदय मैं भी निवास करें।

सिया वर रामचंद्र कि जय।
पवनसुत हनुमान कि जय।


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हनुमान स्तुति (आरती), अर्थ सहित हिंदी मैं

॥ आरती ॥

“लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लंगूर ।
वज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर ॥”

आरती कीजै हनुमान लला की ।
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
जाके बल से गिरवर काँपे ।
रोग-दोष जाके निकट न झांपे ॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई ।
संतन के प्रभु सदा सहाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥

दे बीरा रघुनाथ पठाए ।
लंका जारि सिय सुधि लाये ॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई ।
जात पवनसुत बार न लाई ॥
लंका जारि असुर संहारे ।
सियाराम जी के काज सँवारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥

लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे ।
आनि संजिवन प्राण उबारे ॥
पैठि पताल तोरि जमकारे ।
अहिरावण की भुजा उखारे ॥
बाएं भुजा असुर दल मारे ।
दाहिने भुजा संतजन तारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥

सुर-नर-मुनि जन आरती उतारें ।
जय जय जय हनुमान उचारें ॥
कंचन थार कपूर लौ छाई ।
आरती करत अंजना माई ॥
जो हनुमानजी की आरती गावे ।
बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की। आरती कीजै हनुमान लला की ॥

॥ इति सम्पूर्णम ॥

आरती का अर्थ:

हे हनुमान जी, आपकी लाल वज्र जैसी देह ऊर्जा और तेजस्विता से भरपूर है. आप दुष्ट और दानवों का नाश करने वाले हो, हे कपि शूरवीर हम आपका जयगान करते हैं।

दुष्टों का नाश करने वाले प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान, जिसके बल से बड़े बड़े पहाड़ भी कांपने लगें। रोग, दोष जिसके निकट आने का साहस ना कर पाएं, जो संतों की सदैव सहयता करते हैं। माता अंजनी के ऐसे महावीर पुत्र को हम सभी प्रणाम करते हैं।

हे हनुमान जी आप प्रभु श्री राम के कहने मात्र से सीता माता की खोज के लिए लंका जाकर माता सीता की खबर ले आये। लंका विशाल समुद्र के बीच में स्थित थी, जहाँ तक पहुंचना असंभव समझा जाता था। पर ऐसे विशाल सागर को पार करने में भी अपने समय नहीं लगाया। लंका को जलाकर असुरों का संहार किया, और प्रभु श्रीराम का कार्य पूरा किया, अर्थात् सीता माता की खोज और उन तक संदेश पहुंचाने का कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया। हे हनुमानजी हम सब आपको प्रणाम करते हैं।

जब लक्ष्मण जी युद्ध के दौरान शक्ति लगने से मूर्छित होकर गए थे, तो आपने संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की। आपने पाताल पुरी मैं जाकर न सिर्फ असुर सेना का संहार किया बल्कि अहिरावण जैसे महादैत्य को मृत्युलोक पहुंचा दिया। आप एक तरफ राक्षसों का संहार करते हैं वही दूसरी तरफ संतो की सहायता करते हैं। हे हनुमानजी हम सब आपको प्रणाम करते हैं।

हे हनुमानजी आपकी पूजा देवता, मनुष्य और मुनि सभी करते हैं और आपका जयगान करते हैं. आपका ऐसे महाप्रतापी हैं जिनकी आरती माता अंजनी सोने के थाल में कपूर की ज्योति जलाकर स्वयं करती हैं। जो कोई भी भक्त हनुमान जी की आरती गाता है वह बैकुंठ में निवास करता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। हे दुष्टों का नाश करने वाले प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान, हम सब आपको प्रणाम करते हैं।


रुद्राष्टकम्: संपूर्ण विवरण और अर्थ हिंदी मैं

रुद्राष्टकम् भगवान शिव की स्तुति में रचित एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान राम के अनन्य भक्त गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखा गया है। रुद्राष्टकम् में भगवान शिव के अद्वितीय स्वरूप, महिमा और कृपा का वर्णन किया गया है। आइए इस अद्भुत स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक का अर्थ और महत्ता समझते हैं।

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥

अर्थ: मैं उन ईश्वर को प्रणाम करता हूँ जो निर्वाण स्वरूप, सबके स्वामी, व्यापक, ब्रह्म और वेदों के स्वरूप हैं। जो स्वयं में स्थिर, निर्गुण, विकल्पहीन, इच्छा रहित और चिदाकाश (शुद्ध चेतना) रूप हैं तथा आकाश में निवास करते हैं।

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं
गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्।
करालं महाकाल कालं कृपालं
गुणागार संसारपारं नतोऽहम्॥

अर्थ: जो निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (चौथे अवस्था) हैं। जो वाणी और ज्ञान से परे, ईश्वरीय और पर्वतों के ईश्वर हैं। जो भयावह, महाकाल, काल के भी काल और कृपालु हैं। जो गुणों के भंडार और संसार के पार हैं, मैं उन्हें नमन करता हूँ।

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं
मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरम्।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा
लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥

अर्थ: जो हिमालय के समान गौरवर्ण, गंभीर और करोड़ों कामदेवों की शोभा से युक्त हैं। जिनके मस्तक पर कल-कल करती सुंदर गंगा, मस्तक पर चमकता हुआ चंद्रमा और गले में सर्प शोभायमान हैं।

चलत्कुण्डलं भ्रू-सुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥

अर्थ: जिनके कानों में झूमते कुंडल, सुंदर नेत्र, विशाल स्वरूप, प्रसन्न मुख, नीला कंठ और दयालु स्वभाव हैं। जो मृगचर्म धारण किए हुए हैं, मुंडमाल से सुशोभित हैं, प्रिय शंकर और सबके स्वामी हैं, मैं उनकी आराधना करता हूँ।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटि प्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम्॥

अर्थ: जो प्रचंड, उत्कृष्ट, प्रबल, परमेश्वर, अखंड, अजन्मा और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवान हैं। जो त्रिशूल धारण करने वाले, समस्त दुखों का नाश करने वाले, भवानीपति और भाव से समझे जाने वाले हैं, मैं उनकी भक्ति करता हूँ।

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी
सदा सच्चिनान्द दाता पुरारी।
चिदानन्द सन्दोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी॥

अर्थ: जो काल से परे, कल्याणकारी, कल्पांत को लाने वाले, सदा सत्य-चेतन-आनंद के दाता, पुरारी (त्रिपुरासुर का संहार करने वाले), चिदानंद के स्वरूप और मोह को नष्ट करने वाले हैं। हे मन्मथ (कामदेव) के शत्रु, मुझ पर प्रसन्न होइए।

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम्।
न तावत्सुखं शांति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्व भूताधिवासं॥

अर्थ: जब तक मनुष्य हे उमानाथ, आपके चरणकमलों की भक्ति नहीं करते, तब तक उन्हें इस लोक में या परलोक में न सुख, न शांति, न संताप का नाश मिलता है। हे सर्वभूतों के वासी प्रभु, मुझ पर कृपा कीजिए।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम्।
जराजन्म दुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥

अर्थ: मैं न योग जानता हूँ, न जप, न ही पूजा। मैं सदा सर्वदा आपके ही समर्पित हूँ। जन्म और जरा (बुढ़ापा) के दुखों से पीड़ित हूँ। हे प्रभु शंभु, मेरी रक्षा कीजिए। मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

रूद्राष्टकं इदं प्रोक्तं विप्रेण हर्षोतये
ये पठन्ति नरा भक्तयां तेषां शंभो प्रसीदति।।

अर्थ: जो भी मनुष्य इस स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उन पर भोलेनाथ विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं।

रुद्राष्टकम् भगवान शिव की महिमा और उनकी दिव्यता का सुंदर वर्णन है। इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति के मन में शांति, भक्ति और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र न केवल भगवान शिव की स्तुति करता है बल्कि उनके विभिन्न गुणों और स्वरूपों का भी वर्णन करता है, जो शिव भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। नियमित रूप से रुद्राष्टकम् का पाठ करने से भक्त की समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं और उसे आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है।


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